जानिए नरेन्द्र मोदी के जन्मदिन पर उनके "शून्य" से "शिखर" तक के सफर के बारेमे।

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आज हम बात करेंगे देश के सबसे सफल इंसान के बारेमे आज उनका जन्म दिन भी है साल 1950 में वडनगर गुजरात में बेहद साधारण परिवार में जन्‍मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 17 सितंबर को यानि के आज के दी ही 66 बरस के हो गए. एक चाय बेचने वाले कभी देश का पीएम भी बनेगा ये किसी ने सोचा नहीं था. मोदी ने राजनीति शास्त्र में एमए किया. बचपन से ही उनका संघ की तरफ खासा झुकाव था और गुजरात में आरएसएस का मजबूत आधार भी था. वे 1967 में 17 साल की उम्र में अहमदाबाद पहुंचे और उसी साल उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्यता ली. इसके बाद 1974 में वे नव निर्माण आंदोलन में शामिल हुए. इस तरह सक्रिय राजनीति में आने से पहले मोदी कई वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे.
1980 के दशक में जब मोदी गुजरात की भाजपा ईकाई में शामिल हुए तो माना गया कि पार्टी को संघ के प्रभाव का सीधा फायदा होगा. वे वर्ष 1988-89 में भारतीय जनता पार्टी की गुजरात ईकाई के महासचिव बनाए गए. नरेंद्र मोदी ने लाल कृष्ण आडवाणी की 1990 की सोमनाथ-अयोध्या रथ यात्रा के आयोजन में अहम भूमिका अदा की. इसके बाद वो भारतीय जनता पार्टी की ओर से कई राज्यों के प्रभारी बनाए गए.
मोदी को 1995 में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय सचिव और पांच राज्यों का पार्टी प्रभारी बनाया गया. इसके बाद 1998 में उन्हें महासचिव (संगठन) बनाया गया. इस पद पर वो अक्‍टूबर 2001 तक रहे. लेकिन 2001 में केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद मोदी को गुजरात की कमान सौंपी गई. उस समय गुजरात में भूकंप आया था और भूकंप में 20 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे.
क्या आप जानते हैं, गुजरात में अपना जादू बिखेरने वाले नरेंद्र मोदी कभी साधु बनना चाहते थे? इतना ही नहीं एक वक्त था जब उन्होंने चाय की दुकान भी लगाई. मोदी के जीवन में इसी तरह के कई उतार-चढ़ाव आए. तो जानिए उनके जीवन से जुड़े दिलचस्प प्रसंग…
नरेंद्र मोदी बचपन में आम बच्चों से बिल्कुल अलग थे. काम भी अलग तरह का कर जाते थे. एक बार वो घर के पास के शर्मिष्ठा तालाब से एक घड़ियाल का बच्चा पकड़कर घर लेकर आ गए. उनकी मां ने कहा बेटा इसे वापस छोड़ आओ, नरेंद्र इस पर राजी नहीं हुए. फिर मां ने समझाया कि अगर कोई तुम्हें मुझसे चुरा ले तो तुम पर और मेरे पर क्या बीतेगी, जरा सोचो. बात नरेंद्र को समझ में आ गई और वो उस घड़ियाल के बच्चे को तालाब में छोड़ आए.
नरेंद्र मोदी को हम कई तरह के गेट अप में देखते हैं. दरअसल स्टाइल के मामले में मोदी बचपन से ही थोड़े अलग थे. कभी बाल बढ़ा लेते थे तो कभी सरदार के गेट अप में आ जाते थे. रंगमंच उन्हें खूब लुभाता था. नरेंद्र मोदी स्कूल के दिनों में नाटकों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और अपने रोल पर काफी मेहनत भी करते थे.
नरेंद्र मोदी वड़नगर के भगवताचार्य नारायणाचार्य स्कूल में पढ़ते थे. पढ़ाई में नरेंद्र एक औसत छात्र थे, लेकिन पढ़ाई के अलावा बाकी गतिविधियों में वो बढ़चढ़कर हिस्सा लेते थे. एक तरफ जहां वो नाटकों में हिस्सा लेते थे, वहीं उन्होंने एनसीसी भी ज्वाइन किया था. बोलने की कला में तो उनका कोई जवाब नहीं था, हर वाद विवाद प्रतियोगिता में मोदी हमेशा अव्वल आते थे.
बचपन में नरेंद्र मोदी को साधु संतों को देखना बहुत अच्छा लगता था. मोदी खुद संन्यासी बनना चाहते थे. संन्यासी बनने के लिए नरेंद्र मोदी स्कूल की पढ़ाई के बाद घर से भाग गए थे और इस दौरान मोदी पश्चिम बंगाल के रामकृष्ण आश्रम सहित कई जगहों पर घूमते रहे और आखिर में हिमालय पहुंच गए और कई महीनों तक साधुओं के साथ घूमते रहे. नरेंद्र मोदी बहुत मेहनती कार्यकर्ता थे. आरएसएस के बड़े शिविरों के आयोजन में वो अपने मैनेजमेंट का कमाल भी दिखाते थे.
आरएसएस नेताओं का ट्रेन और बस में रिजर्वेशन का जिम्मा उन्हीं के पास होता था. इतना ही नहीं गुजरात के हेडगेवार भवन में आने वाली हर चिट्ठी को खोलने का काम भी नरेंद्र मोदी को ही करना होता था.
90 के दशक में नरेंद्र मोदी ने आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा में बड़ी भूमिका निभाई थी. इसके बाद उन्हें उस वक्त के बीजेपी अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा का संयोजक बनाया गया. ये यात्रा दक्षिण में तमिलनाडु से शुरू होकर श्रीनगर में तिरंगा लहराकर खत्म होनी थी.
2001 में जब गुजरात में भूकंप के आने से 20,000 लोग मारे गए तब राज्य में राजनीतिक सत्ता में भी बदलाव हुआ. दबाव के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को अपना पद छोड़ना पड़ा. पटेल की जगह नरेंद्र मोदी को राज्य की कमान सौंपी गई और इसके बाद मोदी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. और आज वो देशके सबसे लोकप्रिय राजनेता है
आज तक
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महज 2 हजार रुपए से कैसे बना दी 1.5 लाख करोड़ की कम्पनी जानिए सुब्रत रॉय के बारेमे।

बिहार के एक छोटे से शहर में जन्मे इस शख्स ने एक स्कूटर और महज 2 हजार रुपए की रकम के साथ कारोबारी सफर शुरू किया। छोटी सी शुरुआत के बाद एकसमय उनका बिजनेस एम्पायर 1.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। उनका नाम है सुब्रत रॉय सहारा, जो अब जेल में दिन काट रहे हैं। एक समय उन्हें देश के टॉप 10 बिजनेसमैन में शुमार किया जाने लगा था। हम यहां पर सुब्रत रॉय के बिजनेस टायकून बनने के सफर के बारे में बता रहे हैं…
1 रुपए के डिपॉजिट से शुरू किया था बिजनेस
10 जून 1948 को बिहार के अररिया में जन्मे सुब्रत रॉय की स्कूली पढ़ाई कोलकाता में हुई। बाद में उन्होंने गोरखपुर के गवर्नमेंट टेक्निकल स्कूल से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
उनके कारोबारी सफर की शुरुआत भी गोरखपुर से हुई। रॉय ने 1978 में छोटे स्तर पर बिजनेस शुरू किया। शुरुआत में वह महज 1 रुपए का डिपॉजिट लिया करते थे। उनके जमाकर्ताओं में अधिकांश छोटे तबकों से थे, जिनसे वह आम तौर पर रोजाना पैसे लेने के लिए जाया करते थे।
खड़ा किया 1.5 लाख करोड़ रुपए का एम्पायर
बिजनेस बढ़ने के साथ उन्होंने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई और पैसे जुटाने के लिए कर्मचारी जाने लगे। 1990 के दशक में उन्होंने अपना बिजनेस मॉडल भी पूरी तरह बदल दिया।
इस प्रकार महज 1 रुपए के डिपॉजिट के साथ ही शुरू हुआ सहारा का बिजनेस 35 साल में 1.5 लाख करोड़ रुपए का एम्पायर बन गया। 2000 के दशक में उनके कार्यालयों की संख्या 4,799 तक पहुंच गई। उन्होंने 42 डिपॉजिटर्स के साथ शुरुआत की थी। लगभग तीन दशक के दौरान उनके डिपॉजिटर्स की संख्या 6 करोड़ से ज्यादा हो गई थी।

2 हजार रुपए और एक लंबरेटा स्कूटर के साथ शुरू किया बिजनेस
वर्ष 1978 में उन्होंने गोरखपुर में एक छोटा सा ऑफिस खोला। उन्होंने अपने बिजनेस की शुरुआत महज 2 हजार रुपए और एक लंबरेटा स्कूटर के साथ की थी। उनके ऑफिस में एक मेज और दो कुर्सियां थीं। कर्मचारियों के नाम पर सिर्फ एक क्लर्क और एक लड़का (रनर ब्वॉय) था। उन्होंने अकेले ही डिपॉजिट और पैरा बैंकिंग बिजनेस की शुरुआत की। वह क्लाइंट के पास जाकर खुद ही पैसे जमा करते थे।
बिजनेस बढ़ने के साथ उन्होंने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई और पैसे जुटाने के लिए कर्मचारी भी जाने लगे। 1990 के दशक में वह अपने बिजनेस मॉडल को बदलने की स्ट्रैटजी के बारे में भी सोचने लगे थे।
बदला बिजनेस मॉडल,लखनऊ को बनाया बेस
बिजनेस बढ़ने के साथ ही सहारा ने अपने कारोबारी मॉडल को बदल दिया। इसके लिए किसी बड़े शहर में अपनी कंपनी का बेस बनाना जरूरी था। उन्होंने इसके लिए लखनऊ को चुना, जो गोरखपुर से ज्यादा दूर नहीं था और उत्तर प्रदेश की राजधानी भी था। उन्होंने वर्ष 1990 में  लखनऊ का रुख किया और वहां अपना ऑफिस शुरू किया। इसके बाद उनका बिजनेस लगातार बढ़ता ही गया। सहारा इंडिया की वेबसाइट के मुताबिक फिलहाल उसके सैलरीड और फील्ड वर्कर्स की संख्या 11 लाख है।
देश के टॉप10पावरफुल लोगों में हुए शामिल
जल्द ही वह देश के ताकतवर लोगों में शुमार होने लगे। बिजनेस के अलावा इसकी वजह उनके राजनीतिक और दूसरे क्षेत्रों की बड़ी हस्तियों से संबंध भी थे।
-2012 में देश की एक अग्रणी मैगजीन इंडिया टुडे ने उन्हें देश के टॉप 10 पावरफुल लोगों की लिस्ट में शामिल किया।
-इसके अलावा दुनिया की अग्रणी टाइम मैगजीन ने 2004 में सहारा को इंडियन रेलवे के बाद भारत का ‘दूसरा बड़ा इम्पलॉयर’ करार दिया।
देश-विदेश में खड़ी कीं अरबों की ये संपत्तियां
सहारा इंडिया समूह ने अपने तीन दशक से ज्यादा के ऑपरेशन के दौरान हजारों करोड़ रुपए की संपत्तियां खड़ी कीं। इसमें भारत के कई छोटे-बड़े शहरों में सहारा के रियल्टी प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। देश-विदेश में उन्होंने कई बड़े एसेट्स को खरीदा।
-ग्रोसवेनर हाउस होटल, लंदनः फोर्ब्‍स के मुताबि‍क, लंदन के ग्रोसवेनर हाउस को सहारा ग्रुप ने साल 2010 के अंत में 72.6 करोड़ डॉलर (करीब 3270 करोड़ रुपए ) में खरीदा था।
-प्‍लाजा होटल, न्‍यूयॉर्कः फोर्ब्‍स के मुताबि‍क, नवंबर 2012 में सुब्रत राय सहारा ने प्‍लाजा होटल को 57.5 करोड़ डॉलर (तक करीब 3120 करोड़ रुपए) में खरीदा था।
-ड्रीम हाउसटाउन होटल,  न्‍यूयॉर्कः सुब्रत राय सहारा ने ड्रीम हाउसटाउन होटल को 2012 में 22 करोड़ डॉलर (तब करीब 1,188 करोड़ रुपए ) में खरीदा था।
-सहारा स्‍टार होटल, मुंबईः  सहारा स्‍टार एक 5 स्‍टार होटल है जो मुंबई के डोमेस्‍टि‍क एयरपोर्ट के सामने बना है। होटल का दावा है कि‍ इसके पास दुनि‍या का अकेला मरी‍न लीव्‍स के साथ प्राइवेट डाइनिंग रूम है।

सेबी के निशाने पर आए,बढ़ीं मुश्किलें
सहारा समूह 2009 में ही सेबी के निशाने पर आ गया था। सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसएचआईसीएल) ने रियल एस्टेट में निवेश के नाम पर 3 करोड़ से अधिक निवेशकों से 17,400 करोड़ रुपए जुटाए थे। सितंबर 2009 में सहारा प्राइम सिटी ने आईपीओ लाने के लिए सेबी में डॉक्‍युमेंट जमा किए। सेबी ने अगस्त, 2010 में दोनों कंपनियों की जांच करने के आदेश दिए थे। विवाद बढ़ता गया और आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह की दोनों कंपनियों को निवेशकों को करोड़ों रुपए लौटाने के आदेश दिए थे। सहारा निवेशकों की रकम लौटा नहीं सके और आखिरकार वह गिरफ्तार हो गए।
फिर भी हमें salute करना चाहिए ऐसे इंसान को जो अर्स से फर्स तक पोहचा और उसने लोगो का Investment का नजरिया बदला। प्रॉब्लम चाहे कुछ भी हो लेकिन अपने दम पर सुब्रत रॉय ने कितनो कि जिंदगी बदली इसी लिए हम ने ये स्टोरी आप के साथ शेयर की। इंसान से गलती हो सकती है इंसान गलत नहीं होता। अगर ये स्टोरी आप को अच्छि लगी हो तो शेयर करना न भूले।
धन्यवाद।

शादी की पहली रात ही पत्नी को पता चली कालिदास की कमजोरी, छोड़ दिया!

दुनिया के सर्वोत्तम कवियों में से एक थे महाकवि कालिदास जिन्होंने लगभग पहली सदी में ही दुनिया की सब भाषाओ की जनक रही संस्कृत भाषा में ऐसे साहित्य लिख दिए जो आज के कवियों के लिए भी एक कल्पना से कम नही है.
उनके द्वारा लिए गए मुख्य काव्यो में कुमारसम्भव( शिव पारवती के विवाह पर हिमालय के माहौल पे), रघुवंशा( राजा राम के परदादा के पुरे वंश की महिमा), मालविकाग्निमित्र( एक प्रेम कहानी), विक्रमोरा वषीय( अप्सरा उर्वशी और राजा पुरुरवा की प्रेम कहानी), अभिज्ञान शाकुंतलम, मेघदुता( जिसमे एक यक्ष की व्यथा जो अपनी पत्नी से बिछुड़ गया) और ऋतुसंभरा जिसमे 6 ऋतुओ का अनूप वर्णन है.
लेकिन उनके जीवन के एक सच्चाई बहुत कम लोग ही जानते है!
महाकवि कालिदास शुरू में इतने बुद्धिमता नही थे, वो जवानी तक ढपोर शंख थे. एक बार साधुओ का एक दल जंगल से गुजर रहा था वंहा पर ही काली प्रसाद पेड़ से लकड़ी काट रहा था. वो जिस डाल पर बैठा था उसे ही उलटी तरफ से काट रहा था साधुओ के समझने पर ही वो न समझा और पेड़ से गिर पड़ा.
जब साधुओ ने उसकी महामूर्खता देखि तो उन्हें अपने अपमान के बदले के लिए काली बिलकुल उपयुक्त लगा, एक राजकुमारी थी जिसका नाम था विद्योत्तमा अपने नाम के अनुरूप ही वो शाश्त्रो की ज्ञाता थी और उन साधुओ को भी वो धर्म चर्चा में हरा चुकी थी.

अपने इस अपमान के प्रतिशोष के लिए ऋषियों ने काली को चुना, चूँकि राजकुमारी की शर्त थी की जो भी उससे ज्यादा बड़ा ज्ञानी होगा उसी से वो शादी करेगी.
योजनानुसार काली को एक मौन साधु बनाया गया जो सिर्फ इशारो में बात करता था, उसे चुप रहने को कह के राजा के दरबार में पेश किया और राजकुमारी को बहस की चुनौती दी गई.
राजकुमारी जो भी सवाल पूछती उसपे काली सिर्फ पागलपन के इशारे करता ( जैसा साधुओ ने बताया था) और साधु उन इशारो का राजकुमारी द्वारा पूछे सवालो का सही जवाब देते राजकुमारी हार गई और काली का विवाह राजकुमारी विद्योत्मा से हो गया.
सुहागरात के ही दिन काली नींद में कुछ बड़बड़ाया और राजकुमारी ने सब सुन लिया, तब काली ने सच्चाई बताई तो राजकुमारी क्रोधित हो गई और काली को धक्के मार के राज्य से बहार निकलवा दिया.
बेइज्जत हो काली नदी किनारे आत्महत्या करने के लिए गया पर नदी के दूसरे छोर पर कपडे धुलते देख रुक गया. उसने देखा की कपडे की मार से पत्थर जैसा कठोर भी कोमल हो गया है, तभी अचानक उसके दिल में बिजली चौंधि और आत्महत्या का विचार त्यागा और ज्ञान अर्जन की लालसा जगी.
तब से काली सुबह शाम अपनी इष्ट काली के नाम का ध्यान योग और ज्ञान की भिक्षा मांगने लगा, माता की कृपा हुई और ज्ञान की ऐसी जोत जगी की ढपोरशंख काली, महाकवि कालिदास बन गए.
उन्होंने उज्जैन में ही अपना जीवन जिया( हालाँकि उनके जन्म का प्रमाण 17 वि सदी के अंत में कश्मीरी के मिले) और सेलम राज्य के राजा कुमारदास के राजसभा में उनकी धोखे से हत्या कर दी गई थी उनके ही दरबार के दूसरे कवि ने ईर्ष्या में. 
Latif sharma

महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी।

    
  1. महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
  2. जब अब्राहम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे । तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि- हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए ? तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना, जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ।” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था |“बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘ किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं।
  3. महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।
  4. अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है, तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे, पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी।लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया।
  5. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए।
  6. महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है, जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है।
  7. महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं। इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है। मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को।
  8. हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था।
  9. महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा “श्री जैमल मेड़तिया जी” ने दी थी, जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे। जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे। 
  10. महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था।
  11. मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था। वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे। आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं, तो दूसरी तरफ भील।
  12. महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ । उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है, जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है।
  13. राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी। यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे।
  14. मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था। सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे।
  15. महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।
महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी  

मित्रो, आप सब ने महाराणा  प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद।
उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।
रामप्रसाद हाथी का उल्लेख
अल- बदायुनी, जो मुगलों
की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।
वो लिखता है की- जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी, 

तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी । 
एक तो खुद महाराणा
और दूसरा उनका हाथी
रामप्रसाद।
आगे अल बदायुनी लिखता है
की- वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था ।
वो आगे लिखता है कि-
उस हाथी को पकड़ने के लिए
हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यूह बनाया और उन पर
14 महावतो को बिठाया, तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।
अब सुनिए एक भारतीय
जानवर की स्वामी भक्ति।
उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया ।
जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा।
रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने
और पानी दिया।
पर उस स्वामिभक्त हाथी ने
18 दिन तक मुगलों का न
तो दाना खाया और न ही
पानी पिया और वो शहीद
हो गया।
तब अकबर ने कहा था कि-
जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया,
उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा.?

इसलिए मित्रो हमेशा अपने
भारतीय होने पे गर्व करो।

पढ़कर सीना चौड़ा हुआ हो

तो शेयर कर देना।

अमिताब बच्चन का जीवन परिचय

जन्म नाम : अमिताभ हरिवंश श्रीवास्तव

जन्म : अक्टूबर 11, 1942 (आयु 73 वर्ष)

इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत

अन्य नाम : Big B

व्यवसाय : अभिनेता, निर्माता, पार्श्वगायक

कार्यकाल : 1969 – अब तक

जीवनसाथी : जया भादुड़ी (1973 – अब तक)

सन्तान : अभिषेक बच्चन

श्वेता नंदा

पुरस्कार और सम्मान

फिल्मफेयर पुरस्कार
Best Actor
1978 Amar Akbar Anthony
1979 Don
1992 Hum
2006 Black
2010 Paa

Best Actor (Critics)
2002 Aks
2006 Black

Best Supporting Actor
1972 Anand
1974 Namak Haraam
2001 Mohabbatein

Lifetime Achievement Award (1991)

Superstar of the Millennium (2000)

Filmfare Power Award (2004)

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
Best Newcomer
1970 Saat Hindustani
Best Actor
1991 Agneepath
2006 Black

अमिताभ बच्चन (जन्म-११ अक्टूबर) बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय अभिनेता हैं। १९७० के दशक के दौरान उन्होंने बड़ी लोकप्रियता प्राप्त की और तब से भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे प्रमुख व्यक्तित्व बन गए हैं।

बच्चन ने अपने करियर में कई पुरस्कार जीते हैं, जिनमें तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार और बारह फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार शामिल हैं। उनके नाम सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ अभिनेता फिल्मफेयर अवार्ड का रिकार्ड है। अभिनय के अलावा बच्चन ने पार्श्वगायक, फिल्म निर्माता और टीवी प्रस्तोता और भारतीय संसद के एक निर्वाचित सदस्य के रूप में १९८४ से १९८७ तक भूमिका की हैं। इन्होंने प्रसिद्द टी.वी. शो “कौन बनेगा करोड़पति” में होस्ट की भूमिका निभाई थी |

बच्चन का विवाह अभिनेत्री जया भादुड़ी से हुआ है। इनकी दो संतान हैं, श्वेता नंदा और अभिषेक बच्चन, जो एक अभिनेता भी हैं और जिनका विवाह ऐश्वर्या राय से हुआ है।

बच्चन पोलियो उन्मूलन अभियान के बाद अब तंबाकू निषेध परियोजना पर काम करेंगे। अमिताभ बच्चन को अप्रैल २००५ में एचआईवी/एड्स और पोलियो उन्मूलन अभियान के लिए यूनिसेफ़ गुडविल एंबेसडर नियुक्त किया गया था।[1]

आरंभिक जीवनसंपादित करें

इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश, में जन्मे अमिताभ बच्चन हिंदू कायस्थ परिवार से संबंध रखते हैं। उनके पिता, डॉ॰ हरिवंश राय बच्चन प्रसिद्ध हिन्दी कवि थे, जबकि उनकी माँ तेजी बच्चन कराची के सिख परिवार से संबंध रखती थीं।[2]आरंभ में बच्चन का नाम इंकलाब रखा गया था जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रयोग में किए गए प्रेरित वाक्यांश इंकलाब जिंदाबाद से लिया गया था। लेकिन बाद में इनका फिर से अमिताभ नाम रख दिया गया जिसका अर्थ है, “ऐसा प्रकाश जो कभी नहीं बुझेगा”। यद्यपि इनका अंतिम नाम श्रीवास्तव था फिर भी इनके पिता ने इस उपनाम को अपने कृतियों को प्रकाशित करने वाले बच्चन नाम से उद्धृत किया। यह उनका अंतिम नाम ही है जिसके साथ उन्होंने फिल्मों में एवं सभी सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए उपयोग किया। अब यह उनके परिवार के समस्त सदस्यों का उपनाम बन गया है।

अमिताभ, हरिवंश राय बच्चन के दो बेटों में सबसे बड़े हैं। उनके दूसरे बेटे का नाम अजिताभ है। इनकी माता की थिएटर में गहरी रुचि थी और उन्हें फिल्म में भी रोल की पेशकश की गई थी किंतु इन्होंने गृहणि बनना ही पसंद किया। अमिताभ के करियर के चुनाव में इनकी माता का भी कुछ हिस्सा था क्योंकि वे हमेशा इस बात पर भी जोर देती थी कि उन्हें सेंटर स्टेज को अपना करियर बनाना चाहिए।[3] बच्चन के पिता का देहांत २००३ में हो गया था जबकि उनकी माता की मृत्यु २१ दिसंबर २००७ को हुई थीं।[4]

बच्चन ने दो बार एम. ए. की उपाधि ग्रहण की है। मास्टर ऑफ आर्ट्स (स्नातकोत्तर) इन्होंने इलाहाबाद के ज्ञान प्रबोधिनी और बॉयज़ हाई स्कूल (बीएचएस) तथा उसके बाद नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में पढ़ाई की जहाँ कला संकाय में प्रवेश दिलाया गया। अमिताभ बाद में अध्ययन करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज चले गए जहां इन्होंने विज्ञान स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपनी आयु के २० के दशक में बच्चन ने अभिनय में अपना कैरियर आजमाने के लिए कोलकता की एक शिपिंग फर्म बर्ड एंड कंपनी में किराया ब्रोकर की नौकरी छोड़ दी।

३ जून, १९७३ को इन्होंने बंगाली संस्कार के अनुसार अभिनेत्री जया भादुड़ी से विवाह कर लिया। इस दंपती को दो बच्चों: बेटी श्वेता और पुत्र अभिषेक पैदा हुए।

संदीप माहेश्वरी का प्रेरणादायक जीवन / Sandeep Maheshwari Biography in Hindi

संदीप माहेश्वरी / Sandeep Maheshwari उन करोड़ो लोगो में से एक है जिन्होंने संघर्ष किया, असफल हुए और तेजी से सफलता, ख़ुशी और संतोष पाने के लिए आगे बढ़ते गए. वे अन्य लोगो की ही तरह साधारण परिवार से ही थे, लेकिन अपने जीवन के उद्देश को पूरा करने के लिए उनके पास बहोत सारे सपने और और उन्हें पूरा करने की दृष्टी थी. उनके पास पास जो भी था उन सभी से उन्हें सिखने की तीव्र इच्छा थी. अपने जीवन में कई बार उतार चढाव का सामना करते हुए, समय ने उन्हें जीवन का सही मतलब समझाया.
और जबसे उन्होंने यह जान लिया तब से लगातार अपने आरामदायक स्थिति में बढ़ते चले जा रहे है और अपनी सफलता का रहस्य पूरी दुनिया के साथ Share कर रहे है. बाद में वे लोगो की मदत करने के लिए आगे बढे और वे कुछ ऐसा करना चाहते थे जिस से वे लोगो को सफलता पाने के लिए प्रेरित कर सके, और इसी के चलते उन्होंने लाइव “Free Life-Changing Seminars And Sessions” लेना शुरू किया.

“अगर आपके पास सबकुछ से ज्यादा है। तो उसे उससे शेयर करिये जिन्हें उसकी जरूरत है”  Sandeep Maheshwari 

इसमें कोई शक नहीं है की लाखो लोगो ने उनके द्वारा Share की हुई बातो से प्रेरित होकर उसे अपने भी जीवन में अपनाया होंगा. ये सब उनके अथाक परिश्रम, परिवार के समर्थन और उनके साथियों पर उनके भरोसे ने सतत उन्हें आगे बढाया.
संदीप महेश्वरी / Sandeep Maheshwari का परिवार एलुमिनियम के व्यवसाय में था, जो बाद में बंद हो गया और फिर परिवार की जरूरतों को पूरा करने का दायित्व उन पर आया. और आशा के अनुरूप उन्होंने वो सब कुछ किया जो वो कर सकते थे. वे कोई सामान बनाने वाली Multi-National Company में शामिल हुए और घरगुती उपयोगी सामान की Marketing भी की. उन्होंने कोई भी पत्थर अपने पीछे नहीं छोड़ा. वे हर तरह का काम करते गए जो उन्हें मिला.

“अगर आप उस इंसान की तलाश कर रहे है जो आपकी जिंदगी बदलेगा, तो आईने में देखिये”  Sandeep Maheshwari

उनकी इस अवस्था में उन्होंने जाना की उन्हें औपचारिक शिक्षा (Formal Edu.) से भी आगे की जरुरत है. इसलिए, एक होनहार विधार्थी बनने की बजाये दिल्ली के किरोरिमल कॉलेज के T.Y. B.Com को बिच में ही छोड़ दिया. अब उन्होंने निच्छय किया की उन्हें किसी और विषय का अभ्यास करना चाहिए जिसमे उनकी रूचि हो,

“अपने मनपसंद काम को करो और सफलता पीछे आएगी” Terri Guillemets

संदीप माहेश्वरी जीवन / Sandip Maheshwari Early Life

बहोत ही शानदार मॉडलिंग दुनिया से आकर्षित होकर, उन्होंने 19 साल की उम्र में मॉडल के रूप में अपना करियर शुरू किया. जहा मॉडल के परेशानियों और उनको शोषण का अनुभव उन्हें मिला. और यही उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना जहा उन्होंने ये निच्छित किया की वे दुसरे मॉडल जो संघर्ष कर रहे हो उन्हें प्रेरित करेंगे. और छोटा ही सही, लेकिन यही उनका लक्ष था. और बाद में 2 हफ्तों के फोटोग्राफी क्लास के बाद उन्होंने कई मनमोहक और सुन्दर तस्वीरे अपने कैमरे से निकली. उनमे कोई बदलाव नही आया था. वे तो बस अपनी मॉडलिंग दुनिया को बदलने के प्रयास में तीव्र इच्छा से आगे बढ़ते गये. और इसी प्रकार उन्होंने कुछ समय बाद अपनी खुद की कंपनी मैश ऑडियो प्राइवेट लिमिटेड का निर्माण किया और portfolios बनाना शुरू किया.

“जिस नजर से आप इस दुनिया को देखेंगे, ये दुनिया आप को वेसे ही देखेगी”  Sandeep Maheshwari

अगले साल 2002 में, उन्होंने अपने तिन मित्रो के साथ एक कंपनी स्थापित की जो 6 महीनो में ही बंद हो गयी. लेकिन संदीप महेश्वरी का दिमाग अभी भी खुला ही था. और एक नयी संकल्पना दिल से “Sharing” के साथ उन्होंने अपने अब तक के पुरे अनुभवों को एक मार्केटिंग बुक में लिखा. तब वे सिर्फ 21 साल के थे.

वो 2003 था, जब मात्र 10 घंटे 45 मिनट में 122 मॉडल्स के 10000 से भी ज्यादा फोटो लेकर उन्होंने एक विश्व रिकॉर्ड बनाने वाली कंपनी का निर्माण किया. और आशा के अनुरूप वे कभी नहीं रुके. उनका ध्यान केवल लोगो के कुछ समय के आकर्षण पर नहीं था, बलि वे तो अपने विचारो से समस्त मॉडलिंग दुनिया ही बदलना चाहते थे. और 26 साल की आयु में उन्होंने ImageBazaar.Com को आरम्भ किया. वो साल 2006 था. अपना Business अच्छी तरह से सेट ना होने के कारण वो कई काम एक साथ करने लगे. वे एक वकिल बने, Tele-Caller बने और फोटोग्राफर बने, उन्होंने खुद की इच्छा से ही अपने आप को उन क्षेत्रो में डाला था. और आज, ImageBazaar में भारत की 1 करोड़ से भी ज्यादा फोटो है जो की विश्व में सबसे ज्यादा और साथ ही 45 देशो में 7000 से भी ज्यादा ग्राहक है. उनका ऐसा मानना था की, “फोटोग्राफी में सिर्फ काम नहीं बिकता वहा नाम भी बिकता है, और उन्हें अपना नाम कमाना था.”

संदीप माहेश्वरी ने मॉडलिंग की दुनिया में खुद को ही अपना आदर्श माना. क्यू की उनके अनुसार मुश्किलों और शोषण का सामना कर के एक बेहतरीन मॉडल सामने आ सकता है.ये उनकी दुनिया बदलने वाला प्रयत्न था जब उन्हें 29 साल की आयु में युवा भारत का सबसे प्रसिद्द उद्योगपति चुना गया. बादमे उनके विचार ही उनके भाषण का कारन बनी जैसे,

“असफलता से कभी नहीं डरना” और “खुद के प्रति और दुसरो के प्रति सत्यवादी होना”.

एक सफल उद्यमी के साथ-साथ, दुनियाभर के लाखो-करोडो लोगो के सलाहकार, आदर्श और Youth Icon भी है. वे लगातार लोगो को प्रेरित करते रहे और उनका जीवन “आसान” बनाते गये और उनके इस अच्छे काम के लिए दुनिया भर से लोगो का साथ और प्यार मिलता गया.
उनका ईश्वरीय शक्ति से कभी ना टूटने वाला विश्वास उन्हें हमेशा शक्ति प्रदान करता था. सफलता के इस पहाड़ पर चड़ने के बाद भी उन्हें कभी पैसो का लालच नहीं आया. और इसीलिए आज उनकी प्रेरित करने वाली संस्था किसी मुनाफे के भरोसे नहीं चलती. वहा काम करने वाले हर एक व्यक्ति के बिच भावनात्मक बंधन होता है जो उन्हें एक दुसरे से और उस संस्था से जोड़े रखता है, और यही उनके लिए जरुरी है.
आज उनमे कई सारे संस्थाओ को निर्माण करने की क्षमता है लेकिन वो अपने खुद के द्वारा बनाये गये इस Status से ही संस्तुष्ट है. उनका ऐसा मानना है की, “अगर आपके पास आपकी जरुरत से ज्यादा कोई वस्तु हो तो आपको वो उन लोगो के साथ बाटनी चाहिए जिनको उस वस्तु की सबसे ज्यादा जरुरत हो”.

और इस तरह से परेशानियों की जड़ो में जाकर उन्होंने उन्होंने कई सारी सच्चाई लोगो के सामने लाइ, जैसे की, “पैसे ये पेड़ो पर बढ़ते है”, “सफलता ये केवल कठिन परिश्रम पर निर्भर नहीं करती” और जबसे ज्यादा मजेदार “आसान कहकर भी किसी काम को आसानी से ना करना”.

अपने बुरे अनुभवों को ध्यान में रखना ही उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बना, उनका अनुभव ये बुरे अनुभव से ही बना. संदीप महेश्वरी का ऐसा मानना है की चाहे आप कोई भी काम एक रुपये से शुरू करो या एक लाख से शुरू करो (अपने खुद के पैसो से), बस काम को शुरू करना बहोत जरुरी है, ये कोई मायने नहीं रखता के आपने उसे कितने पैसो से शुरू किया.
उनका लक्ष केवल लोगो को सुलझाना और कल के आने वाले उद्योगपतियों/लोगो/नेताओ को प्रेरित कर के भविष्य में सफलता के लिए मदत करना है.

Sandeep Maheshwari Award / उपलब्धिया —

• “व्यापार दुनिया” पत्रिका द्वारा भारत के सबसे होनहार उद्योगपति.
• “ET Now” चैनल के Tomorrow Award के अकेले हकदार.
• ग्लोबल यूथ मार्केटिंग फोरम द्वारा “स्टार यूथ अचिवर” का अवार्ड दिया गया.
• भारतीय उद्योग समिति द्वारा सन 2013 में Creative उद्योगपति का सम्मान.
• ब्रिटिश हाई कमीशन के ही भाग,ब्रिटिश काउंसिल द्वारा “ Creative युवा उद्योगपति” का अवार्ड
• इसके भी अलावा, वे कई पत्रिकाओ (Magazine), अखबार और टेलीविज़न चैनल जैसे The Economic Times, इंडिया टुडे, CNBC-TV18 में भी उन्हें सम्मानित किया गया.

दोस्तों, जब कोई साधारण इंसान असाधारण काम करता है (कुछ बड़ा करता है) तो अपने आप ही वो हमारे-आपके जैसे Common लोगो के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन जाता है. क्योकि उसे देखकर लगता है, यार ये तो बिलकुल अपनी तरह का बंदा है, और जब ये कर सकता है तो हम क्यू नहीं? संदीप महेश्वरी भी बिलकुल वैसा ही बंदा है …
मिडिल क्लास परिवार का एक आम सा बंदा जिसने अपने जीवन में कुछ बड़ा किया है और जो हमें भी अपनी Life में कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित करता है.