भगवान शिव क्यों रहते है श्मशान में, क्यों भूत-प्रेत है उनके गण?

भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य भी उतने ही विचित्र है। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। महाशिवरात्रि (7 मार्च, सोमवार) के अवसर पर हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-

1. भगवान शिव को क्यों कहते श्मशान का निवासी?
भगवान शिव को वैसे तो परिवार का देवता कहा जाता है, लेकिन फिर भी श्मशान में निवास करते हैं। भगवान शिव के सांसारिक होते हुए भी श्मशान में निवास करने के पीछे लाइफ मैनेजमेंट का एक गूढ़ सूत्र छिपा है। संसार मोह-माया का प्रतीक है जबकि श्मशान वैराग्य का।
भगवान शिव कहते हैं कि संसार में रहते हुए अपने कर्तव्य पूरे करो, लेकिन मोह-माया से दूर रहो। क्योंकि ये संसार तो नश्वर है। एक न एक दिन ये सबकुछ नष्ट होने वाला है। इसलिए संसार में रहते हुए भी किसी से मोह मत रखो और अपने कर्तव्य पूरे करते हुए वैरागी की तरह आचरण करो।

2. क्यों है भूत-प्रेत शिव के गण?
शिव को संहार का देवता कहा गया है। अर्थात जब मनुष्य अपनी सभी मर्यादाओं को तोड़ने लगता है तब शिव उसका संहार कर देते हैं। जिन्हें अपने पाप कर्मों का फल भोगना बचा रहता है वे ही प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं। चूंकि शिव संहार के देवता हैं। इसलिए इनको दंड भी वे ही देते हैं। इसलिए शिव को भूत-प्रेतों का देवता भी कहा जाता है।
दरअसल यह जो भूत-प्रेत है वह कुछ और नहीं बल्कि सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है। भगवान शिव का यह संदेश है कि हर तरह के जीव जिससे सब घृणा करते हैं या भय करते हैं वे भी शिव के समीप पहुंच सकते हैं, केवल शर्त है कि वे अपना सर्वस्व शिव को समर्पित कर दें।

3. भगवान शिव गले में क्यों धारण करते हैं नाग?
भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनका वस्त्र व आभूषण भी उतने ही विचित्र हैं। सांसारिक लोग जिनसे दूर भागते हैं। भगवान शिव उसे ही अपने साथ रखते हैं। भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता हैं जो गले में नाग धारण करते हैं। देखा जाए तो नाग बहुत ही खतरनाक प्राणी है, लेकिन वह बिना कारण किसी को नहीं काटता।
नाग पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण जीव है। जाने-अंजाने में ये मनुष्यों की सहायता ही करता है। कुछ लोग डर कर या अपने निजी स्वार्थ के लिए नागों को मार देते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव नाग को गले में धारण कर ये संदेश देते हैं कि जीवन चक्र में हर प्राणी का अपना विशेष योगदान है। इसलिए बिना वजह किसी प्राणी की हत्या न करें।

4. भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल क्यों?
त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति।
हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।

5. भगवान शिव ने क्यों पीया था जहर?
देवताओं और दानवों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से निकला विष भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया था। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ के नाम से प्रसिद्ध हुए। समुद्र मंथन का अर्थ है अपने मन को मथना, विचारों का मंथन करना। मन में असंख्य विचार और भावनाएं होती हैं, उन्हें मथ कर निकालना और अच्छे विचारों को अपनाना। हम जब अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार ही निकलेंगे।
यही विष हैं, विष बुराइयों का प्रतीक है। शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। उसे अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। शिव का विष पीना हमें यह संदेश देता है कि हमें बुराइयों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए। बुराइयों का हर कदम पर सामना करना चाहिए। शिव द्वारा विष पीना यह भी सीख देता है कि यदि कोई बुराई पैदा हो रही हो तो हम उसे दूसरों तक नहीं पहुंचने दें।

6. क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल?
भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम भोलेनाथ भी जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह कामदेव को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।

साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है कि हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।

7. क्यों है भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा?

भगवान शिव का एक नाम भालचंद्र भी प्रसिद्ध है। भालचंद्र का अर्थ है मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाला। चंद्रमा का स्वभाव शीतल होता है। चंद्रमा की किरणें भी शीतलता प्रदान करती हैं। लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो भगवान शिव कहते हैं कि जीवन में कितनी भी बड़ी समस्या क्यों न आ जाए, दिमाग हमेशा शांत ही रखना चाहिए। यदि दिमाग शांत रहेगा तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल भी निकल आएगा।
ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक ग्रह माना गया है। मन की प्रवृत्ति बहुत चंचल होती है। भगवान शिव का चंद्रमा को धारण करने का अर्थ है कि मन को सदैव अपने काबू में रखना चाहिए। मन भटकेगा तो लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाएगी। जिसने मन पर नियंत्रण कर लिया, वह अपने जीवन में कठिन से कठिन लक्ष्य भी आसानी से पा लेता है।

8. क्यों हैं भगवान शिव की तीन आंखें?

धर्म ग्रंथों के अनुसार, सभी देवताओं की दो आंखें हैं, लेकिन एकमात्र शिव ही ऐसे देवता हैं जिनकी तीन आंखें हैं। तीन आंखों वाला होने के कारण इन्हें त्रिनेत्रधारी भी कहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो शिव का तीसरा नेत्र प्रतीकात्मक है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में आने वाली मुसीबतों से सावधान करना।
जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं, जिन्हें हम समझ नहीं पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराते हैं। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस जरूरत है उसे जगाने की।

9. शिव अपने शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं?

हमारे धर्म शास्त्रों में जहां सभी देवी-देवताओं को वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित बताया गया है, वहीं भगवान शंकर को सिर्फ मृग चर्म (हिरण की खाल) लपेटे और भस्म लगाए बताया गया है। भस्म (राख) शिव का प्रमुख वस्त्र भी है, क्योंकि शिव का पूरा शरीर ही भस्म से ढंका रहता है। शिव का भस्म रमाने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक कारण भी हैं।
भस्म की एक विशेषता होती है कि यह शरीर के रोम छिद्रों को बंद कर देती है। इसका मुख्य गुण है कि इसको शरीर पर लगाने से गर्मी में गर्मी और सर्दी में सर्दी नहीं लगती। भस्म त्वचा संबंधी रोगों में भी दवा का काम करती है। भस्मी धारण करने वाले शिव यह संदेश भी देते हैं कि परिस्थितियों के अनुसार अपने आपको ढालना ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है।

10. भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं भांग-धतूरा?

भगवान शिव को भांग-धतूरा मुख्य रूप से चढ़ाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान को भांग-धतूरा चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं। भांग व धतूरा नशीले पदार्थ हैं। आमजन इनका सेवन नशे के लिए करते हैं। लाइफ मैनेजमेंट के अनुसार, भगवान शिव को भांग-धतूरा चढ़ाने का अर्थ है अपनी बुराइयों को भगवान को समर्पित करना।
यानी अगर आप किसी प्रकार का नशा करते हैं तो इसे भगवान को अर्पित करे दें और भविष्य में कभी भी नशीले पदार्थों का सेवन न करने का संकल्प लें। ऐसा करने से भगवान की कृपा आप पर बनी रहेगी और जीवन सुखमय होगा।

11. भगवान शिव को क्यों चढ़ाते हैं बिल्व पत्र?

शिवपुराण आदि ग्रंथों में भगवान शिव को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व बताया गया है। 3 पत्तों वाला बिल्व पत्र ही शिव पूजन में उपयुक्त माना गया है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि बिल्वपत्र के तीनों पत्ते कहीं से कटे-फटे न हो।
लाइफ मैनेजमेंट के दृष्टिकोण से देखा जाए तो बिल्व पत्र के ये तीन पत्ते चार पुरुषार्थों में से तीन का प्रतीक हैं- धर्म, अर्थ व काम। जब आप ये तीनों निस्वार्थ भाव से भगवान शिव को समर्पित कर देते हैं तो चौथा पुरुषार्थ यानी मोक्ष अपने आप ही प्राप्त हो जाता है।

12. कैलाश पर्वत क्यों है भगवान शिव को प्रिय?

शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव कैलाश पर्वत पर निवास करते हैं। पर्वतों पर आम लोग नहीं आते-जाते। सिद्ध पुरुष ही वहां तक पहुंच पाते हैं। भगवान शिव भी कैलाश पर्वत पर योग में लीन रहते हैं। लाइफ मैनेजमेंट की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत प्रतीक है एकांत व ऊंचाई का।
यदि आप किसी प्रकार की सिद्धि पाना चाहते हैं तो इसके लिए आपको एकांत स्थान पर ही साधना करनी चाहिए। ऐसे स्थान पर साधना करने से आपका मन भटकेगा नहीं और साधना की उच्च अवस्था तक पहुंच जाएगा।
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नवरात्रमें करे इस मंत्र का जप! होगी सभी समस्याए दूर।

माता गायत्री की प्रसन्नता के लिए गायत्री मंत्र का जप सर्वश्रेष्ठ उपाय है। यदि कोई व्यक्ति हर रोज इस मंत्र का जप करता है तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं। अभी मां की कृपा पाने का श्रेष्ठ समय नवरात्र चल रहा है। इन दिनों में गायत्री मंत्र जप से बहुत ही जल्दी शुभ फल प्राप्त किए जा सकते हैं।

यहां जानिए गायत्री मंत्र के उपाय और खास बातें…

गायत्री मंत्र-

ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।

गायत्री मंत्र का अर्थ: सृष्टि की रचना करने वाले, प्रकाशमान परमात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, परमात्मा का यह तेज हमारी बुद्धि को सही मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।

इस मंंत्र का जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग करना श्रेष्ठ होता है।

शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र सर्वश्रेष्ठ मंत्रों में से एक है। इस मंत्र के जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। इन तीन समय को संध्याकाल कहा जाता है।

गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है प्रात:काल- सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के बाद तक करना चाहिए।

मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर- दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है।

तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त से कुछ देर पहले- सूर्यास्त से पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए।

इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर, मानसिक रूप से करना चाहिए। मंत्र जप अधिक तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।

मंत्र के जप से मिलते हैं ये 10 लाभ
इस मंत्र के जप से हमें यह दस लाभ प्राप्त होते हैं। ये 10 लाभ इस प्रकार हैं- उत्साह एवं सकारात्मकता मिलती है, त्वचा में चमक आती है, तामसिकता दूर होती है, परमार्थ कार्यों में रुचि जागती है, पूर्वाभास होने लगता है, आशीर्वाद देने की शक्ति बढ़ती है, आंखों में आकर्षण आता है, स्वप्न सिद्धि प्राप्त होती है, क्रोध शांत होता है, ज्ञान की वृद्धि होती है।

विद्यार्थियों के लिए
विद्यार्थियों के लिए तो यह मंत्र विशेष रूप से लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का जप 108 बार करने से विद्यार्थी को विद्या प्राप्त करने में आसानी हो जाती है। विद्यार्थियों का पढ़ने में मन नहीं लगना, याद किया हुआ भूल जाना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है।

दरिद्रता से मुक्ति के लिए
यदि किसी व्यक्ति को व्यापार या नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती है, धन की कमी है, व्यय अधिक है तो उन्हें गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचाता है। शुक्रवार को पीले कपड़े पहनें और हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र का जप 108 बार करें। मंत्र के आगे और पीछे ‘श्रीं’ सम्पुट लगाकर जप करने से दरिद्रता दूर होती है। इसके साथ ही रविवार को व्रत किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।

सम्पुट- जो बीज मंत्र किसी मंत्र के आगे और पीछे लगाए जाते हैं, उन्हें सम्पुट कहा जाता है।

संतान संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए
संतान सुख प्राप्त नहीं हो रहा हो अथवा संतान रोगी हो तो रोज सुबह ये उपाय करें। उपाय के अनुसार,, पति-पत्नी सफेद कपड़े पहनकर ‘यौं’ बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप 108 बार रोज करें। ऐसा करने से संतान संबंधी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिल सकती है।

शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए
यदि कोई व्यक्ति शत्रुओं के कारण परेशानियां झेल रहा हो तो उसे रोज या मंगलवार, अमावस्या या रविवार को लाल कपड़े पहनकर माता दुर्गा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र का जप 108 बार करना चाहिए। मंत्र के आगे और पीछे ‘क्लीं’ बीज मंत्र का तीन बार सम्पुट लगाएं। इससे शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। मित्रों में सद्भाव, परिवार में एकता बनी रहती है तथा न्यायालय संबंधी कार्यों में भी विजय प्राप्त होती है।

विवाह में देरी हो रही हो तो
यदि किसी व्यक्ति के विवाह में देरी हो रही हो तो सोमवार को सुबह के समय पीले कपड़े पहनें। माता पार्वती का ध्यान करते हुए’ह्रीं’ बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर 108 बार गायत्री मंत्र का जप करने से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। यह साधना स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं।

यदि किसी रोग के कारण परेशानियां हो तो
यदि किसी रोग से परेशान हैं और रोग से मुक्ति जल्दी चाहते हैं तो किसी भी शुभ मुहूर्त में ये उपाय करें। एक कांसे के बर्तन में साफ पानी भरकर रख लें। लाल आसन पर बैठकर ‘ऐं ह्रीं क्लीं’ का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप 108 बार करें। जप के बाद पानी को पी लें। ऐसा करने से रोगों से मुक्ति मिल सकती है। यही जल किसी दूसरे रोगी को देने से उसके रोग भी दूर हो सकते हैं।
जीवन मंत्र

भर जायेगी आपकी तिजोरी भी! बस करना होगा रात को ये काम..

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जब हम आर्थिक तंगी से गुजर रहे होते हैं, परेशानी में होते हैं या फिर हमारा कोई काम नहीं बन रहा होता है तो हमारे जेहन में बस यहीं विचार उठता रहता है कि कैसे भी, किसी भी तरह से बस ये समस्या दूर हो जाए। सोचते रहते हैं कि काश कोई ऐसा उपाय हो जो इस परेशानी से निजात दिला दे।
ऐसे में आज हम आपको ऐसा ही एक उपाय बता रहे हैं तो आपकी आर्थिक परेशानियों को खत्म करने में आपकी मदद करेगा। वास्तु शास्त्र के मुताबिक अगर आप हर रोज रात के वक्त इस काम को करेंगे तो आप न केवल अपनी आर्थिक तंगी से छुटकारा पा सकेंगे बल्कि आपकी तिजोरी में धन-दौलत से भर जाएगी। वास्तु शास्त्र के जानकारों के मुताबिक अगर आप हर रोज रात के 3 बजे से लेकर 5 बजे के बीच में उठकर घर के उस स्थान पर जाएं जहां से आप खुले आकाश को साफ-साफ देख सकते हों।
खुले आसमान के नीचे पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके आसमान को देखते हुए मां लक्ष्मी को ध्यान करें। दोनों हाथ जोड़कर माता लक्ष्मी की प्रार्थना करें और उनसे अपनी समस्या बताएं। माता लक्ष्मी की प्रार्थना करने के बाद दोनों हाथों को नीचे करके हथेलियों को अपने मुंह पर फेर लें। ऐसा करने से कुछ दिनों में ही आपकी समस्या दूर हो जाएगी और मां लक्ष्मी की कृपा आप पर होने लगेगी।
इसके अलावा अपने मंदिर में थोड़ा बदलाव करें। चूकिं मां लक्ष्मी उत्तर दिशा में वास करती हैं, इसलिए आप माता लक्ष्मी की तस्वीर या फिर श्री रूप उत्तर दिशा की ओर स्थापित करें। इससे उत्तर दिशा सक्रिय होगी और घर में धन का आगमन होगा।

शनिवार और मंगलवार को करे ये उपाय, दूर होंगी परेशानिया!

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हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार शनिदेव व भगवान हनुमान की आराधना से दुनिया का हर सुख प्राप्त किया जा सकता है। जहां शनि अच्छे कर्मों का फल देकर भक्त पर कृपा करते हैं, तो वहीं श्रीहनुमान की कृपा बल, बुद्धि, ज्ञान व सफलता के रूप में मिलती है।
शनिवार व मंगलवार शनि और हनुमान दोनों ही देवताओं की भक्ति के विशेष दिन माने गए हैं। इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से दोनों ही देवताओं की कृपा प्राप्त हो सकती है। जानिए शनिवार व मंगलवार को कैसे पाएं शनिदेव व हनुमानजी का आशीर्वाद-
1. शनिवार व मंगलवार को सुबह-शाम स्नान के बाद नवग्रह मंदिर में शनि व श्रीहनुमान की जल स्नान व विशेष सामग्रियों से पूजा करें।
2. पूजा में शनिदेव को गंध, अक्षत, फूल, तेल, तिल, काले वस्त्र तो श्रीहनुमान को सिंदूर, लाल चंदन, फूल, अक्षत व लाल वस्त्र चढ़ाएं।
3. शनिदेव को तिल के व्यंजन तो हनुमान को गुड़ के पकवान का भोग लगाएं।
4. शनिदेव व हनुमानजी के सरल मंत्रों का जाप कम से कम एक माला यानी 108 बार करें।
5. पूजा व मंत्र जाप के बाद हनुमानजी व शनिदेव की धूप व दीप आरती कर सफलता व सौभाग्य की कामना करें।
श्रीहनुमान ध्यान मंत्र
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।
हनुमान ध्यान मंत्र के बाद इन आसान हनुमान नाम मंत्रों का सुख-समृद्धि की कामना से स्मरण करें-
1. ॐ बलसिद्धिकाय नम:।
2. ॐ सर्वबन्धविमोक्त्रे नम:।
3. ॐ सर्वदु:खहराय नम:।
शनि स्मरण मंत्र
नीलाञ्जनं समाभासं रविपुत्रं विनायकम्।
छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।
शनि स्मरण मंत्रों के बाद इन नाम मंत्रों का भी ध्यान करें सुख-सौभाग्य की कामना से करें-
1. ॐ दीनार्तिहरणाय नम:।
2. ॐ दैन्यनाशकराय नम:।
3. ॐ भानुपुत्राय नम:।
Jivan upyogi batain

अगर आप हो रहे है परेसान तो इस मंत्र से होंगे चमत्कारिक लाभ।

मंत्र जप, एक ऐसा उपाय है जिससे किसी भी प्रकार की समस्या को दूर किया जा सकता है। सभी शास्त्रों में मंत्रों को बहुत शक्तिशाली और चमत्कारी बताया है। यानी मंत्रों से मनचाही वस्तु प्राप्त की जा सकती है और सभी इच्छाओं की पूर्ति की जा सकती है। सबसे ज्यादा प्रभावी मंत्रों में से एक मंत्र है गायत्री मंत्र। इसके जप से बहुत जल्दी शुभ फल प्राप्त हो सकते हैं। इसके नियमित जप से पूर्वाभास हो सकता है।

ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।। 

मंत्र के जप के 10 लाभ

यदि कोई व्यक्ति इस मंत्र का जप नियमित रूप से करता है तो उसे उत्साह एवं सकारात्मकता, त्वचा में चमक आती है, तामसिकता से घृणा होती है, परमार्थ में रुचि जागती है, पूर्वाभास होने लगता है, आशीर्वाद देने की शक्ति बढ़ती है, नेत्रों में तेज आता है, स्वप्र सिद्धि प्राप्त होती है, क्रोध शांत होता है, ज्ञान की वृद्धि होती है।
मंत्र विद्या का प्रयोग
मंत्र विद्या का प्रयोग भगवान की भक्ति, ब्रह्मज्ञान प्राप्ति के लिए किया जाता है। साथ ही, सांसारिक एवं भौतिक सुख-सुविधाओं, धन प्राप्त करने की इच्छा के लिए भी मंत्रों का जप किया जा सकता है।
मंत्र जप के लिए समय
शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र को सर्वश्रेष्ठ मंत्र बताया गया है। इस मंत्र जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। इन तीन समय को संध्याकाल भी कहा जाता हैं। गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है प्रात:काल, सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के पश्चात तक करना चाहिए।
मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर मध्यान्ह का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। इसके बाद तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए।
इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए।  
मंत्र जप अधिक तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।
गायत्री मंत्र-  
ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।।
गायत्री मंत्र का सरल अर्थ: सृष्टि कर्ता यानी सृष्टी की रचना करने वाले प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं। परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सही मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।
शास्त्रों में इसके जप की विधि विस्तृत रूप से दी गई हैं। मंत्र इस मंत्र को जप करने के लिए रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करना श्रेष्ठ होता है।
चमत्कारी शिव मंत्र 
दरिद्रता के नाश के लिए-
यदि किसी व्यक्ति के व्यापार, नौकरी में हानि हो रही है या कार्य में सफलता नहीं मिलती, आमदनी कम है तथा व्यय अधिक हैं तो उन्हें गायत्री मंत्र का जप काफी फायदा पहुंचा सकता है। शुक्रवार को पीले वस्त्र पहनकर हाथी पर विराजमान गायत्री माता का ध्यान करें। ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र के आगे और पीछे श्रीं सम्पुट लगाकर जप करने से दरिद्रता का नाश होता है। साथ ही, रविवार को व्रत किया जाए तो ज्यादा लाभ होता है।
विद्यार्थियों के लिए-
गायत्री मंत्र का जप सभी के लिए उपयोगी है, विद्यार्थियों के लिए तो यह मंत्र बहुत लाभदायक है। रोजाना इस मंत्र का एक सौ आठ बार जप करने से विद्यार्थी को सभी प्रकार की विद्या प्राप्त करने में आसानी होती है। विद्यार्थियों का पढ़ने में मन नहीं लगना, याद किया हुआ भूल जाना, शीघ्रता से याद न होना आदि समस्याओं से निजात मिल सकती है।
संतान संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए…
किसी दंपत्ति को संतान प्राप्त करने में कठिनाई आ रही हो या संतान से दुखी हो अथवा संतान रोग ग्रस्त हो तो प्रात: पति-पत्नी एक साथ सफेद वस्त्र धारण करें। इसके बाद यौं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। संतान संबंधी किसी भी समस्या से शीघ्र मुक्ति मिलती है।
शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए…
यदि कोई व्यक्ति शत्रुओं के कारण परेशानियां झेल रहा हो तो उसे प्रतिदिन या विशेषकर मंगलवार, अमावस्या अथवा रविवार को यह उपाय करना चाहिए। उपाय के अनुसार लाल वस्त्र पहनकर माता दुर्गा का ध्यान करते हुए गायत्री मंत्र के आगे एवं पीछे क्लीं बीज मंत्र का तीन बार सम्पुट लगाकार एक सौ आठ बार जप करना चाहिए। ऐसा करने से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। मित्रों में सद्भाव, परिवार में एकता होती है। न्यायालयों के कार्यों में भी विजय प्राप्त होती है।
विवाह कार्य में देरी हो रही हो तो…
यदि किसी भी व्यक्ति के विवाह में अनावश्यक देरी हो रही हो तो हर सोमवार को सुबह के समय पीले वस्त्र धारण कर माता पार्वती का ध्यान करते हुए ह्रीं बीज मंत्र का सम्पुट लगाकर एक सौ आठ बार जाप करने से विवाह कार्य में आने वाली समस्त बाधाएं दूर होती हैं। यह साधना स्त्री-पुरुष दोनों कर सकते हैं।
यदि किसी रोग के कारण परेशानियां हो तो…
यदि कोई व्यक्ति किसी रोग से परेशान है और रोग से मुक्ति जल्दी चाहता है तो किसी भी शुभ मुहूर्त में एक कांसे के बर्तन में स्वच्छ जल भरें। उसके सामने लाल आसन पर बैठकर ऐं ह्रीं क्लीं का सम्पुट लगाकर गायत्री मंत्र का जप करें। जप के पश्चात जल से भरे पात्र का सेवन करने से गंभीर रोग का नाश होता है। यही जल किसी अन्य रोगी को पीने के लिए देने से उसके भी रोग का नाश होता है।

चमत्कारी शिव मंत्र (shiv mantra)

श्री शिव के पूजन में शिव मंत्रों का जप मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला माना गया है। ऐसी मान्यता है कि मंत्रों द्वारा की गई पूजन भगवान तक सरलता से पहुंचती है, क्योंकि इसमें वाणी द्वारा भगवान की स्तुति होती है। जानते हैं शिव पूजन के सरल मंत्रों के बारे में।

भगवान शंकर का पंचाक्षर मंत्र
शिव पंचाक्षर मंत्र भगवान शंकर को अतिप्रिय है। शिव पूजन में रुद्राक्ष की माला से इस मंत्र का 108 बार पाठ किया जाना चाहिए। यह मंत्र शिव को अतिशीघ्र प्रसन्न करता है। यह मंत्र मनोकामना पूर्ति में सहायक है।

ऊँ नमः शिवाय।

शिव गायत्री मंत्र

ऊँ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात।।

द्वादश ज्योतिर्लिंग मंत्र

द्वादश ज्योतिर्लिंग मंत्र एक ध्यान मंत्र है। जिसमें शिव के प्रमुख 12 तीर्थ स्थानों के नामों के बारे में बताया गया हैं । मंत्र की यह महिमा बताई गई है कि सुबह, शाम दोनों समय इस मंत्र का जप करने से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

सौराष्ट्रे सोम्नथन्च, श्री शैलेमल्लिकार्जुनं।
उज्जैन्यांमहाकालं मोम्कारं ममलेश्वरं।।
परल्यां वैद्यनाथं च, दाखिन्यां भीमशन्करं।
सेतुबन्धेतुरामेषं नागेशं दारुकावने।।
वाराणष्यां तु विश्वेशं, त्रयंबकं गौतमि तटे।
हिमालये तु केदारं धुश्मेषं च शिवालये।।
एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि, सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्त जन्म कृतं पापं स्मरेण विनश्यति।।

शिव मंत्र

ऊँ पार्वतीपतये नमः।
ऊँ नमो नीलकण्ठाय।

  1. ऊँ साम्ब शिवाय नमः।

शिव नमस्कार मंत्र

नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शन्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।।
ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिर्ब्रम्हणोधपतिर्ब्रम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।।

मंत्र जाप करने वाली माला में 108 मोती ही क्यों होते है।

भगवान का मंत्र जाप करने के लिये हमें माला की आवश्‍यकता पड़ती है, लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि मंत्र जाप करने की माला में 108 दाने ही क्‍यों होते हैं? इसके पीछे कई धार्मिक और वैज्ञानिक कारण छिपे हुए हैं, जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं।

कहते हैं कि बिना माला के मंत्र जाप का कोई फल प्राप्‍त नहीं होता। हमारे शास्‍त्रों के अनुसार, माला के बिना किया गया जप संख्‍याहीन होता है और ऐसे जप का पूरा फल प्राप्‍त नहीं हो पाता। इसलिए मंत्र जप करते समय माला का उपयोग अवश्य करना चाहिए।

इसी तरह दूसरी मान्‍यता के अनुसार, माला के 108 मोती और सूर्य की कलाओं का संबंध है। एक वर्ष में सूर्य लगभग 216000 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। इस तरह सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है। इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटा कर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का हर एक मोती सूर्य की हर एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले भगवान हैं। भगवान सूर्य मनुष्य को तेजस्वी बनाते हैं और समाज में मान-सम्मान दिलाते हैं।

ज्योतिष के अनुसार, ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 राशियों में 9 ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु घूमते रहते हैं। अगर ग्रहों की संख्या 9 और राशियों की संख्या 12 का गुणा किया जाए तो संख्या 108 मिलती है। इसलिए 108 मोतियों की माला पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक मानी जाती है।