क्या यही है कांग्रेस की राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषा?

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क्या यही है कांग्रेस की राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषा?

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की सफलता से निराश और हताश कांग्रेस गहरे अवसाद से ग्रस्त है। पार्टी और उसके नेता यह समझ नहीं पा रहे हैं कि इस अवसाद की अवस्था में वो देश के समक्ष कैसे एक जिम्मेदार राजनीतिक दल की भूमिका निभायें।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तो इस हताशा में देश विरोधी और देश हित का अंतर तक नहीं समझ पा रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू ) में जो कुछ भी हुआ उसे कहीं से भी देश हित के दायरे में रखकर नहीं देखा जा सकता है। देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में देश विरोधी नारे लगें और आतंकवादियों की खुली हिमायत हो, इसे कोई भी नागरिक स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन कांग्रेस उपाध्यक्ष और उनकी पार्टी के अन्य नेताओं ने जेएनयू जाकर जो बयान दिए हैं उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनकी सोच में राष्ट्रहित जैसी भावना का कोई स्थान नहीं है।

जेएनयू में वामपंथी विचारधारा से प्रेरित कुछ मुट्ठीभर छात्रों ने निम्नलिखित राष्ट्रविरोधी नारे लगाए:

• “पाकिस्तान जिंदाबाद”
• “गो इंडिया गो बैक”
• “भारत की बरबादी तक जंग रहेगी जारी”
• “कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी जारी”
• “अफ़ज़ल हम शर्मिन्दा है तेरे कातिल ज़िंदा हैं”
• “तुम कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा”
• “अफ़ज़ल तेरे खून से इन्कलाब आयेगा”

इन छात्रों को सही ठहराकर राहुल गांधी किस लोकतांत्रिक व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं। क्या राहुल गांधी के लिए राष्ट्रभक्ति की परिभाषा यही है ? देशद्रोह को छात्र क्रान्ति और देशद्रोह के खिलाफ कार्यवाही को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात का नाम देकर उन्होंने राष्ट्र की अखण्डता के प्रति संवेदनहीनता का परिचय दिया है | मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि इन नारों का समर्थन करके क्या उन्होंने देश की अलगाववादी शक्तियों से हाथ मिला लिया है ? क्या वह स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति की आड़ में देश में अलगाववादियों को छूट देकर देश का एक और बटवारा करवाना चाहते हैं?

देश की राजधानी में स्थित एक अग्रणी विश्वविद्यालय के परिसर को आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देने का केंद्र बना कर इस शिक्षा के केंद्र को बदनाम करने की साजिश की गयी| मैं राहुल गांधी से पूछना चाहता हूँ कि क्या केंद्र सरकार का हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना राष्ट्रहित में होता ? क्या आप ऐसे राष्ट्रविरोधियों के समर्थन में धरना देकर देशद्रोही शक्तियों को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं ?

जेएनयू में राहुल गांधी ने वर्त्तमान भारत की तुलना हिटलर की जर्मनी से कर डाली | इतनी ओछी बात करने से पहले वह भूल जाते हैं कि स्वतंत्र भारत की हिटलर की जर्मनी से सबसे निकट परिकल्पना सिर्फ श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए 1975 के आपातकाल से की जा सकती है | स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति तो दूर, आपातकाल में विरोधियों को निर्ममता के साथ जेल में ठूंस दिया गया था | वामदलों के नेता जिनकी वह आज हिमायत करते घूम रहे हैं, वह भी इस बर्बरता के शिकार हुए थे | हिटलरवाद सिर्फ कांग्रेस के डी.एन.ए. में है, भाजपा को राष्ट्रवाद और प्रजातंत्र के मूल्यों की शिक्षा कांग्रेस पार्टी से लेने की जरूरत नहीं है | हमारे राजनैतिक मूल्य भारतवर्ष की समृद्ध संस्कृति से प्रेरित है और भारत का संविधान हमारे लिए शासन की निर्देशिका है | मैं राहुल गांधी से जानना चाहता हूँ कि 1975 का आपातकाल क्या उनकी पार्टी के प्रजातांत्रिक मूल्यों को परिभाषित करता है और क्या वह श्रीमती इंदिरा गांधी की मानसिकता को हिटलरी मानसिकता नहीं मानते?

देश की सीमाओं की रक्षा और कश्मीर में अलगाववाद को नियंत्रित करते हुए हमारे असंख्य सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं | 2001 में देश की संसद में हुए आतंकवादी हमले में दिल्ली पुलिस के 6 जवान, 2 संसद सुरक्षाकर्मी और एक माली शहीद हुए थे | इसी आतंकी हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू का महिमा मंडल करने वालों और कश्मीर में अलगाववाद के नारे लगाने वालों को समर्थन देकर राहुल गांधी अपनी किस राष्ट्रभक्ति का परिचय दे रहे हैं? मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि अभी हाल में सियाचिन में देश की सीमा के प्रहरी 10 सैनिकों जिनमे लांस नायक हनुमंथप्पा एक थे के बलिदान को क्या वह इस तरह की श्रद्धांजली देंगे ?

भाजपा के केंद्र की सत्ता में आने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से कश्मीर में भी देश विरोधी भावनाओं को नियंत्रित करने में सफलता मिल रही है। लेकिन प्रमुख विपक्षी दल होने के बावजूद कांग्रेस इस काम में सरकार को सहयोग करने के बजाए जेएनयू में घटित शर्मनाक घटना को हवा दे रही है। प्रगतिशीलता के नाम पर वामपंथी विचारधारा का राष्ट्रविरोधी नारों को समर्थन किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

मैं कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी और उपाध्यक्ष राहुल गाँधी से ऊपर उल्लेखित सवालों का 125 करोड़ देशवासियों की ओर से जवाब मांगता हूँ और यह भी मांग करता हूँ कि राहुल गाँधी अपने इस कृत्य के लिए देश से मांफी मांग।
 By Amit shah
 base.amitshah.in

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)

                      राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्वज

संस्थापकडॉ॰: केशव बलिराम हेडगेवार

प्रकार: स्वैच्छिक,[1] अर्द्धसैनिक[2]

स्थापना वर्ष: विजयदशमी 1925

कार्यालय: नागपुर

अक्षांश-रेखांश: 21°02′N 79°10′E / 21.04°N 79.16°E

मुख्य लोग: सरसंघचालक मोहन भागवत

सेवाक्षेत्र: भारत

विशेष ध्येय: हिन्दू राष्ट्रवाद के सहायक और हिन्दू परम्पराओं को कायम रखना

लक्ष्य:”मातृभूमि के लिए नि:स्वार्थ सेवा”

तरीक़ा:समूह चर्चा, बैठकों और अभ्यास के माध्यम से शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण

सदस्य: 5-6 मिलियन[3]

वेबसाइट: rssonnet.org

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ( R.S.S.)
एक हिंदू संघटन है जिसके सिद्धान्त हिंदुत्व में निहित और आधारित हैं। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपेक्षा संघ या आर.एस.एस. के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत सन् १९२५ में विजयादशमी के दिन डॉ॰ केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी। बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है।

सबसे पहले ५० वर्ष बाद १९७५ में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो तत्कालीन जनसंघ पर भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल हटने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ और केन्द्र में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व में मिलीजुली सरकार बनी। १९७५ के बाद से धीरे-धीरे इस संगठन का राजनैतिक महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे राजनैतिक दल के रूप में हुई जिसे आमतौर पर संघ की राजनैतिक शाखा के रूप में देखा जाता है। संघ की स्थापना के ७५ वर्ष बाद सन् २००० में प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एन०डी०ए० की मिलीजुली सरकार भारत की केन्द्रीय सत्ता पर आसीन हुई।

संघ परिवार की संरचनात्मक व्यवस्था
संघ के संस्थापक डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार
संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघ चालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान में पूरे भारत में संघ की लगभग पचास हजार से ज्यादा शाखा लगती हैं। वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल, योग, वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है।

संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है:
केंद्र
क्षेत्र
प्रान्त
विभाग
जिला
तालुका
नगर
मण्डल
शाखा

संघ की शाखा
शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे की लगती है। शाखा में खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है। शाखाएँ निम्न प्रकार की होती हैं:

प्रभात शाखा: सुबह लगने वाली शाखा को “प्रभात शाखा” कहते है।

सायं शाखा: शाम को लगने वाली शाखा को “सायं शाखा” कहते है।

रात्रि शाखा: रात्रि को लगने वाली शाखा को “रात्रि शाखा” कहते है।

मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को “मिलन” कहते है।

संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को “संघ-मण्डली” कहते है।

पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५०,००० शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर “भारतीय स्वयंसेवक संघ” तो कहीं “हिन्दू स्वयंसेवक संघ” के माध्यम से चलता है।
शाखा में “कार्यवाह” का पद सबसे बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए “मुख्य शिक्षक” का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है।
जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है, वह “स्वयंसेवक” कहलाता है।

संघ वर्ग
१९३९ के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय का फोटो
ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं:

दीपावली वर्ग – ये वर्ग तीन दिनों का होता है। ये वर्ग तालुका या नगर स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दीपावली के आस पास आयोजित होता है।

शीत शिविर या (हेमंत शिविर) – ये वर्ग तीन दिनों का होता है, जो जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दिसंबर में आयोजित होता है।

निवासी वर्ग – ये वर्ग शाम से सुबह तक होता है। ये वर्ग हर महीने होता है। ये वर्ग शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है।

संघ शिक्षा वर्ग – प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष – कुल चार प्रकार के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं। “प्राथमिक वर्ग” एक सप्ताह का होता है, “प्रथम” और “द्वितीय वर्ग” २०-२० दिन के होते हैं, जबकि “तृतीय वर्ग” 25 दिनों का होता है। “प्राथमिक वर्ग” का आयोजन सामान्यतः जिला करता है, “प्रथम संघ शिक्षा वर्ग” का आयोजन सामान्यत: प्रान्त करता है, “द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग” का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र करता है। परन्तु “तृतीय संघ शिक्षा वर्ग” हर साल नागपुर में ही होता है।

बौद्धिक वर्ग – ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।

शारीरिक वर्ग – ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।

सामाजिक सुधार में योगदान
हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है।

महात्मा गान्धी ने १९३४ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहाँ पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं।[5]

राहत और पुनर्वास
सुनामी के उपरान्त सहायता कार्य में जुटे स्वयंसेवक
राहत और पुर्नवास संघ कि पुरानी परंपरा रही है। संघ ने १९७१ के उड़ीसा चक्रवात और १९७७ के आंध्र प्रदेश चक्रवात में रहत कार्यों में महती भूमिका निभाई है।

संघ से जुडी सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान ५७ अनाथ बच्चों को गोद लिया हे जिनमे ३८ मुस्लिम और १९ हिंदू है।

उपलब्धियाँ
संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन १९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी, उपराष्ट्रपति पद पर भैरोंसिंह शेखावत, एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं।

संघ के सरसंघचालक
डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टरजी (१९२५ – १९४०)
माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य गुरूजी (१९४० – १९७३)
मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस (१९७३ – १९९३)
प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया (१९९३ – २०००)
कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य सुदर्शनजी (२००० – २००९)
डॉ॰ मोहनराव मधुकरराव भागवत (२००९ -)

संघ की प्रार्थना
प्रार्थना की मुद्रा में स्वयंसेवक
मुख्य लेख : नमस्ते सदा वत्सले
संघ की प्रार्थना संस्कृत में है।
प्रार्थना की आखरी पंक्ति हिंदी में है।
लड़कियों/स्त्रियों की शाखा राष्ट्र सेविका समिति और विदेशों में लगने वाली हिन्दू स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना अलग है। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यत: गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।

नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥

समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम्।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥
॥ भारत माता की जय ॥

प्रार्थना का हिन्दी में अर्थसंपादित करें
हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे कोई न जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा विश्व हमारी विनयशीलता के सामने नतमस्तक हो। यह रास्ता काटों से भरा है, इस कार्य को हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे सुगम कर काँटों रहित करेंगे।

ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र श्रेष्ट साधन उग्र वीरव्रत की भावना हमारे अन्दर सदेव जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में जलती रहे। आपकी असीम कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने में समर्थ हो।
॥ भारत माता की जय॥

सहयोगी सँस्थाएँ
सेवा भारती
विद्या-भारती
स्वदेशी जागरण मंच
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद
हिंदू स्वयंसेवक संघ
भारतीय मजदूर संघ
भारतीय किसान संघ
संघ साहित्य के प्रकाशकसंपादित करें

निम्नलिखित प्रकाशन संघ की योजना द्वारा संचालित नहीं है, निजी हैं। इन प्रकाशनों ने भी उच्च कोटि का संघ साहित्य बड़ी संख्या में प्रकाशित किया है।

१. सुरुचि प्रकाशन , देशबन्धु गुप्ता मार्ग , झण्डेवाला, नई दिल्ली-५५

२. लोकहित प्रकाशन , संस्कृति भवन ; राजेन्द्र नगर, लखनऊ-४

३. राष्ट्रोत्थान साहित्य , केशव शिल्प ; केम्पगौड़ा नगर, बंगलौर-१९

४. भारतीय विचार साधना

(क) डॉ॰ हेडगेवार भवन महाल, नागपुर-४४०००२
(ख) मोती बाग ; ३०९, शनिवार पेठ, पुणे-४११०३०
(ग) मंगलदास बाड़ी, डॉ॰ भडकम्कर मार्ग नाज सिनेमा परिसर, मुम्बई-४०००४
५. ज्ञान गंगा प्रकाशन , भारती भवन, बी-१५, न्यू कालोनी, जयपुर-३०२००१

६. अर्चना प्रकाशन , एच.आई.जी.-१८, शिवाजी नगर, भोपाल-४६२०१६

७. साधना पुस्तक प्रकाशन , राम निवास ; बलिया काका मार्ग, जूनाढोर बाजार के सामने, कांकरिया, अमदाबाद -३८००२८

८. सातवलेकर स्वाध्याय , पो – किलापारडी , मण्डल जिला-वलसाड, गुजरात-३९६१२५

९. साहित्य निकेतन , ३-४/८५२, बरकतपुरा, हैदराबाद-५०००२७

१०. स्वस्तिश्री प्रकाशन , ४४/९, नवसहयाद्री सोसाइटी , नवसहयाद्री पोस्टास मोर पुणे-४११०५२

११. जागृति प्रकाशन , एफ. १०९, सेक्टर-
१२. सूर्य भारती प्रकाशन , २५९६, नई सड़क, दिल्ली- 

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सरदार वल्लभभाई पटेल अगर होते देश के पहले वडाप्रधान तो देश होता कुछ और जानिए नेहरू से पटेल ज्यादा प्रभावसलि नेता थे।

                           

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी एवं स्वतन्त्र भारत के प्रथम गृहमंत्री थे। सरदार पटेल बर्फ से ढंके एक ज्वालामुखी थे। वे नवीन भारत के निर्माता थे। राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी थे। वास्तव में वे भारतीय जनमानस अर्थात किसान की आत्मा थे।

भारत की स्वतंत्रता संग्राम मे उनका महत्वपूर्ण योगदान है। भारत की आजादी के बाद वे प्रथम गृह मंत्री और उपप्रधानमंत्री बने। उन्हे भारत का ‘लौह पुरूष’ भी कहा जाता है।

पटेल का जन्म नडियाद, गुजरात में एक पाटीदार कृषक परिवार में हुआ था। वे झवेरभाई पटेल एवं लाडबा देवी की चौथी संतान थे। सोमाभाई, नरसीभाई और विट्टलभाई उनके अग्रज थे। उनकी शिक्षा मुख्यतः स्वाध्याय से ही हुई। लन्दन जाकर उन्होंने बैरिस्टर की पढाई की और वापस आकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होने भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन में भाग लिया।

स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। गुजरात का खेडा खण्ड (डिविजन) उन दिनो भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हे कर न देने के लिये प्रेरित किया। अन्त में सरकार झुकी और उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी।

बारडोली के किसानों के साथ (1928) बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार और बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा।

सरदार पटेल १९२० के दशक में गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन के समय कांग्रेस में भर्ती हुए। १९३७ तक उन्हे दो बार कांग्रेस के सभापति बनने का गौरव प्राप्त हुआ। वे पार्टी के अन्दर और जनता में बहुत लोकप्रिय थे। कांग्रेस के अन्दर उन्हे जवाहरलाल नेहरू का प्रतिद्वन्दी माना जाता था।

यद्यपि अधिकांश प्रान्तीय कांग्रेस समितियाँ पटेल के पक्ष में थीं, गांधी जी की इच्छा का आदर करते हुए पटेल जी ने प्रधानमंत्री पद की दौड से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हे उपप्रधान मंत्री एवं गृह मंत्री का कार्य सौंपा गया। किन्तु इसके बाद भी नेहरू और पटेल के सम्बन्ध तनावपूर्ण ही रहे। इसके चलते कई अवसरों पर दोनो ने ही अपने पद का त्याग करने की धमकी दे दी थी।

गृह मंत्री के रूप में उनकी पहली प्राथमिकता देसी रियासतों (राज्यों) को भारत में मिलाना था। इसको उन्होने बिना कोई खून बहाये सम्पादित कर दिखाया। केवल हैदराबाद के आपरेशन पोलो के लिये उनको सेना भेजनी पडी। भारत के एकीकरण में उनके महान योगदान के लिये उन्हे भारत का लौह पुरूष के रूप में जाना जाता है। सन १९५० में उनका देहान्त हो गया। इसके बाद नेहरू का कांग्रेस के अन्दर बहुत कम विरोध शेष रहा।

देसी राज्यों (रियासतों) का एकीकरण
भारत के राज्यो का राजनीतिक एकीकरण सरदार पटेल ने आजादी के ठीक पूर्व (संक्रमण काल में) ही पीवी मेनन के साथ मिलकर कई देसी राज्यों को भारत में मिलाने के लिये कार्य आरम्भ कर दिया था। पटेल और मेनन ने देसी राजाओं को बहुत समझाया कि उन्हे स्वायत्तता देना सम्भव नहीं होगा। इसके परिणामस्वरूप तीन को छोडकर शेष सभी राजवाडों ने स्वेच्छा से भारत में विलय का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। केवल जम्मू एवं कश्मीर, जूनागढ तथा हैदराबाद के राजाओं ने ऐसा करना नहीं स्वीकारा। जूनागढ के नवाब के विरुद्ध जब बहुत विरोध हुआ तो वह भागकर पाकिस्तान चला गया और जूनागढ भी भारत में मिल गया। जब हैदराबाद के निजाम ने भारत में विलय का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया तो सरदार पटेल ने वहाँ सेना भेजकर निजाम का आत्मसमर्पण करा लिया। किन्तु नेहरू ने काश्मीर को यह कहकर अपने पास रख लिया कि यह समस्या एक अन्तराष्ट्रीय समस्या है।।

                             गांधीजी, पटेल और मौलाना आजाद 1940

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू व प्रथम उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल में आकाश-पाताल का अंतर था। यद्यपि दोनों ने इंग्लैण्ड जाकर बैरिस्टरी की डिग्री प्राप्त की थी परंतु सरदार पटेल वकालत में पं॰ नेहरू से बहुत आगे थे तथा उन्होंने सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य के विद्यार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था। नेहरू प्राय: सोचते रहते थे, सरदार पटेल उसे कर डालते थे। नेहरू शास्त्रों के ज्ञाता थे, पटेल शस्त्रों के पुजारी थे। पटेल ने भी ऊंची शिक्षा पाई थी परंतु उनमें किंचित भी अहंकार नहीं था। वे स्वयं कहा करते थे, “मैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ानें नहीं भरीं। मेरा विकास कच्ची झोपड़ियों में गरीब किसान के खेतों की भूमि और शहरों के गंदे मकानों में हुआ है।” पं॰ नेहरू को गांव की गंदगी, तथा जीवन से चिढ़ थी। पं॰ नेहरू अन्तरराष्ट्रीय ख्याति के इच्छुक थे तथा समाजवादी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे।

देश की स्वतंत्रता के पश्चात सरदार पटेल उप प्रधानमंत्री के साथ प्रथम गृह, सूचना तथा रियासत विभाग के मंत्री भी थे। सरदार पटेल की महानतम देन थी 562 छोटी-बड़ी रियासतों का भारतीय संघ में विलीनीकरण करके भारतीय एकता का निर्माण करना। विश्व के इतिहास में एक भी व्यक्ति ऐसा न हुआ जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो। 5 जुलाई 1947 को एक रियासत विभाग की स्थापना की गई थी। एक बार उन्होंने सुना कि बस्तर की रियासत में कच्चे सोने का बड़ा भारी क्षेत्र है और इस भूमि को दीर्घकालिक पट्टे पर हैदराबाद की निजाम सरकार खरीदना चाहती है। उसी दिन वे परेशान हो उठे। उन्होंने अपना एक थैला उठाया, वी.पी. मेनन को साथ लिया और चल पड़े। वे उड़ीसा पहुंचे, वहां के 23 राजाओं से कहा, “कुएं के मेढक मत बनो, महासागर में आ जाओ।” उड़ीसा के लोगों की सदियों पुरानी इच्छा कुछ ही घंटों में पूरी हो गई। फिर नागपुर पहुंचे, यहां के 38 राजाओं से मिले। इन्हें सैल्यूट स्टेट कहा जाता था, यानी जब कोई इनसे मिलने जाता तो तोप छोड़कर सलामी दी जाती थी। पटेल ने इन राज्यों की बादशाहत को आखिरी सलामी दी। इसी तरह वे काठियावाड़ पहुंचे। वहां 250 रियासतें थी। कुछ तो केवल 20-20 गांव की रियासतें थीं। सबका एकीकरण किया। एक शाम मुम्बई पहुंचे। आसपास के राजाओं से बातचीत की और उनकी राजसत्ता अपने थैले में डालकर चल दिए। पटेल पंजाब गये। पटियाला का खजाना देखा तो खाली था। फरीदकोट के राजा ने कुछ आनाकानी की। सरदार पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर अपनी लाल पैंसिल घुमाते हुए केवल इतना पूछा कि “क्या मर्जी है?” राजा कांप उठा। आखिर 15 अगस्त 1947 तक केवल तीन रियासतें-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद छोड़कर उस लौह पुरुष ने सभी रियासतों को भारत में मिला दिया। इन तीन रियासतों में भी जूनागढ़ को 9 नवम्बर 1947 को मिला लिया गया तथा जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। 13 नवम्बर को सरदार पटेल ने सोमनाथ के भग्न मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, जो पंडित नेहरू के तीव्र विरोध के पश्चात भी बना। 1948 में हैदराबाद भी केवल 4 दिन की पुलिस कार्रवाई द्वारा मिला लिया गया। न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था।

जहां तक कश्मीर रियासत का प्रश्न है इसे पंडित नेहरू ने स्वयं अपने अधिकार में लिया हुआ था, परंतु यह सत्य है कि सरदार पटेल कश्मीर में जनमत संग्रह तथा कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने पर बेहद क्षुब्ध थे। नि:संदेह सरदार पटेल द्वारा यह 562 रियासतों का एकीकरण विश्व इतिहास का एक आश्चर्य था। भारत की यह रक्तहीन क्रांति थी। महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को इन रियासतों के बारे में लिखा था, “रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।”

यद्यपि विदेश विभाग पं॰ नेहरू का कार्यक्षेत्र था, परंतु कई बार उप प्रधानमंत्री होने के नाते कैबिनेट की विदेश विभाग समिति में उनका जाना होता था। उनकी दूरदर्शिता का लाभ यदि उस समय लिया जाता तो अनेक वर्तमान समस्याओं का जन्म न होता। 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था और चीन का रवैया कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बतलाया था। अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा कहा था। उन्होंने यह भी लिखा था कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा। 1950 में नेपाल के संदर्भ में लिखे पत्रों से भी पं॰ नेहरू सहमत न थे। 1950 में ही गोवा की स्वतंत्रता के संबंध में चली दो घंटे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्ता सुनने के पश्चात सरदार पटेल ने केवल इतना कहा “क्या हम गोवा जाएंगे, केवल दो घंटे की बात है।” नेहरू इससे बड़े नाराज हुए थे। यदि पटेल की बात मानी गई होती तो 1961 तक गोवा की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा न करनी पड़ती।

गृहमंत्री के रूप में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (आई.सी.एस.) का भारतीयकरण कर इन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आई.ए.एस.) बनाया। अंग्रेजों की सेवा करने वालों में विश्वास भरकर उन्हें राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोड़ा। यदि सरदार पटेल कुछ वर्ष जीवित रहते तो संभवत: नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता।

सरदार पटेल जहां पाकिस्तान की छद्म व चालाकी पूर्ण चालों से सतर्क थे वहीं देश के विघटनकारी तत्वों से भी सावधान करते थे। विशेषकर वे भारत में मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्टों की विभेदकारी तथा रूस के प्रति उनकी भक्ति से सजग थे। अनेक विद्वानों का कथन है कि सरदार पटेल बिस्मार्क की तरह थे। लेकिन लंदन के टाइम्स ने लिखा था “बिस्मार्क की सफलताएं पटेल के सामने महत्वहीन रह जाती हैं। यदि पटेल के कहने पर चलते तो कश्मीर, चीन, तिब्बत व नेपाल के हालात आज जैसे न होते। पटेल सही मायनों में मनु के शासन की कल्पना थे। उनमें कौटिल्य की कूटनीतिज्ञता तथा महाराज शिवाजी की दूरदर्शिता थी। वे केवल सरदार ही नहीं बल्कि भारतीयों के हदय के सरदार थे।

अगर वह इस देश पहले वडाप्रधान बने होते तो देश आज कुछ और होता लेकिन यइ देश का दुर्भाग्य है। हर इक मुद्दे पे जो उनकी पकड़ है वो किसी और नेता की नहीं हो सकती। 

धन्यवाद wikipedia

भारतीय राज्यव्यवस्था (Indian politics)

भारत की राजनीति संयुक्त संसदीय प्रतिनिधीय लोकतांत्रिक राज्य के ढांचे में ढली है, जहां पर प्रधानमंत्री सरकार का प्रमुख होता है और बहु-दलीय तंत्र होता है। शासन एवं सत्ता सरकार के हाथ में होती है। संयुक्त वैधानिक बागडोर सरकार एवं संसद के दोनो सदनों, लोक सभा एवं राज्य सभा के हाथ में होती है। न्याय मण्डल शासकीय एवं वैधानिक, दोनो से स्वतंत्र होता है। पर इस वक़्त लोकतंत्र से फॉरवर्ड बैकवर्ड कास्ट वाली भावनाओं को हटाने की जरुरत है ! नहीं तो बैक्वोर्ड समाज लुट लुट कर ख़तम ही हो जायेगा! इसके लिए अलग से कोई नियम बनाने के बजाये अपनी मन से बुरे भावनाओ को हटाना होगा ! जो सायद संभव नहीं है ! पर पक्षपात वाली राजनीती घातक सिध्ध हो सकती है

संविधान के अनुसार, भारत एक प्रधानसमाजवादीधर्म-निरपेक्षलोकतांत्रिक राज्य है, जहां पर सरकार जनता के द्वारा चुनी जाती है। अमेरिका की तरह, भारत में भी संयुक्त सरकार होती है, लेकिन भारत में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों की तुलना में अधिक शक्तिशाली है, जो कि ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली पर आधारित है। बहुमत की स्थिति में न होने पर सरकार न बना पाने की दशा में अथवा विशेष संवेधानिक परिस्थिति के अंतर्गत, केन्द्र सरकार राज्य सरकार को निष्कासित कर सकती है और सीधे संयुक्त शासन लागू कर सकती है, जिसे राष्ट्रपति शासन कहा जाता है।

 

भारतीय राजव्यवस्था ( Indian Politics)

सन १९४६ में कैबिनेट मिशन प्लान के अंतर्गत भारत के संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा के गठन का प्रस्ताव रखा गयाबी एन राव को संविधान सभा संवैधानिक सलाह कर नियुक्त किया गया था |

संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन ९ दिसंबर,१९४६ को संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में प्रारंभ हुआ |

डा. सच्चिदानंद सिन्हा को सर्व सम्मति से अस्थायी अध्यक्ष चुना गया |११ दिसंबर,१९४६ की बैठक में डा. राजेन्द्र प्रसाद को सभा का स्थायी अध्यक्ष चुना गया |

१३ दिसंबर, १९४६ को पं. जवाहर लाल नेहरु ने उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत कर संविधान की आधारशिला रखी|

संविधान निर्माण का कार्य करने के लिए अनेक समितियां बनायीं गयी, जिनमे प्रमुख डा. आंबेडकर की अध्यक्षता में बनी ७ सदस्यों वाली प्रारूप समिति थी |

प्रारूप समिति में डा. अम्वेड़कर के अतिरिक्त सर्वश्री एन. गोपाल स्वामी आयंगर अल्लादी क्रष्णास्वामी अय्यर, के . एम मुंशी , मोहम्मद सादुल्लाह, दी पी. खेतान(1948 में इनकी मरतु के पश्चात टी टी क्रष्णामाचारी ) और एन. माधवराव अन्य सदाशय थे |

संविधान को टायर करने में २ साल ११ महीने 18 दिन का समय लगा |

संविधान २६ नवम्बर १९४९ को बन कर तैयार हो गया था और इसी दिन एस पर अध्यक्ष के हस्ताक्षर हुए |

हालाँकि संविधान २६ नवम्बर १९४९ को बन कर तैयार हो गया था परन्तु इसके अधिकतर भागो को २६ जनबरी १९५० को लागु किया गया क्यूंकि सन १९३० से ही सम्पूर्ण भारत में २६ जनवरी का दिन स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया जाता था | 

इसी लिए २६ जनवरी १९५० को प्रथम गणतंत्रता दिवस मनाया जाता है |

संविधान सभा की अंतिम बैठक २४ जनवरी १९५० को हुयी और इसी दिन संविधान सभा द्वारा डा. राजेंदर प्रसाद को भारत का प्रथम राष्ट्रपति चुना गया|

नव निर्मित संविधान में ३९५ अनुच्छेद २२ भाग तथा ८ अनुसूचिय थी |

डा. भीमराव अम्वेड़कर को भारतीय संविधानके जनक के रूप में जाना जाता है।

हम भारत के लोग कर्तव्य निभाए, राष्ट्र बनाए।

   

नमस्कार आज 26/11 के दिन आपसे कुछ शेयर करना चाहते है हमारे देश के बारेमे देश के असली हीरो के बारेमे इस वर्ष सिमा पर लड़ते हुवे 35 जवान सहिद हुवे है पिछले 6 वर्ष सिमा पर लड़ते हुवे 252 जवानने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया ये असली हीरो है।

पर आज इस देश को मंथन करना होगा की हम उनके लायक है। आज हम एक सहिद की सहादत और अंतिम विदाई की बात करेगे जिसे आपको जानना होगा ये भारत की सहनसिलता की बात होगी ऐसे आप संतोष महाडिक की अंतिम विदाय का सर्वेक्षर भी कह सकते है पिछले वर्ष में सेना के 2 कमादिन्ग ऑफिसर आतंकवादी से लड़ते हुवे सहिद हुवे है लेकिन हमारे देशमें इस बात को सेह लिया जाता है। जरा शोचिये अगर येही France, Britain, या America में हुवा होता तो पूरा देश घरसे निकल कर सड़को पे आ जाता पैरिश हमले के बाद पुरे फ्रांस ने एक होकर दुस्मनको बर्बाद करने की कसम खायी है। और 120 घंटे में आतंकवाद के मास्टर माइंड को मार गिराया जाता है। जबकि हमारे देश में आज ही के दीन 2008 के मुम्बई में हमला हुवा था इन हमलो का मास्टरमाइंड आजभी आजाद घूम रहा है क्यों?

क्योंकि नेताओ को राजनीती से फुरसत नहीं मिलती भारत में नेताओं को हमेशा अपने voters की चिंता लगी रहती है। और वही वजह है आतंकवाद से लड़ने की उनकी अंतर आत्मा कभी नहीं जागती भारत आतंकवाद के खिलाफ अशनसिल कब बनेगा कहते है एक सहिद की अंतिम यात्रा में सामिल होना 4 धाम की यात्रा में सामिल होने से ज़्यादा पुण्य का काम है आज हम बात करेगे देश की सहनसिलता के बारेमे।

सिमा पर इस वर्ष हमारे देश के 35 जवान और पिछले 6 वर्ष में 252 जवान ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया। ये देश के असली हीरो है नायक है। हमें आज सोचना होगा क्या हम इस असली नायको के बलिदान के लायक है। इस वर्ष सेना के दो कमांडिंग ऑफिसर आज देश के लिये सहिद हो जाते है। लेकिन इस देशको कुछ फर्क नहीं पड़ता इस देशमें एक पत्ता तक नहीं हिलता सोचिये यही France, Britain, या America में हुवा होता तो पूरा देश अपने घरोसे निकलकर सड़क पे आ जाता। Paris हमलो के बाद पूरा देश एक होकर दुश्मनको बर्बाद करने की कसम खाता है वहा ऐसे समय में विपक्ष के नेता नाही राजनीती करते है नाहीं सरकार को कोसते है।

लेकिन भारतमे नेताओ को राजनीती से फुर्सद नहीं मिलती। भारत में नेताओ को अपने वोटो की चिंता सताती रहती है। कब तक सन्तोष महाडिक जेसे वीर सहिद होते रहेंगे लोग कबतक अपना सामान्य जीवन जीते रहेंगे। एक गरीब का बेटा जिसके पिता दरजी थे और भाई दूध बेचते थे और कैसे वह गरीब का बेटा अपने संघर्ष और मेहनत से सेना की अलिय force में कमांडिंग ऑफिसर बन जाता है। और देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर देता है।
हम इनकी सहादत को याद करना चाहिये और देश को मंथन करना चाहिए कब तक हमारे देश के बेटे आतंकवाद से लड़ते हुवे सहिद होते रहेंगे।

क्या हमारे देश के बुद्धि जीवी इस मुद्दे पर अवॉर्ड वापिस करेंगे। कबतक तक ऐसी सहादत पर देश सहनसिल बनता रहेंगा।इस देशका दुर्भाग्य है की यहाँ अगर दादरी जेसी कोई घटना होती है तो तमाम नेता अपनी राजनीती रोटिया सेकने वह पोहच जाते है क्योंकि ईस घटना में उन्हें आपने वॉट दिखाय देते है।

जब दादरी की घटना हुए थी तो वहां Rahul ghandhi, Arvind kejrival, Ashuddin oveshi, Vrundda karak जेसे तमाम बड़े नेता पोहच जाते है और संतोष महाडिक जेसे असली हीरो को सहादत देने के लिए नेताओ को वक्त नहीं मिलता सिर्फ रक्षा मंत्री Manohar parikar आखरी सलाम देने पोहचे। इसके लिए हमें उनकी तारीफ करनी होगी कमसे कम वो तो वहां पोहचे

ये बहोत बड़ा विरोधाभास है इसपे देश को छोचना चाहिए पर हमारे देश के लोगो को ये एहसास ही नहीं है की हमारे जवान सिमा पर किस हालात में रेह कर देश और हमारी हिफाजत करते है। जिससे आप और हम सलामत रह सके खुसिया मना सके त्यौहार मना सके चेन से रह सके। सलाम है ऐसे देश के वीर जवान को असली हीरो को।

लेकिन हमें अपनी छोच बदलनी होगी हमें एक होकर चलना है राजनीती नहीं करनी है, हमें वीर को सहादत देनी है और दुश्मनो को नसीहत देनी है और देश के गद्धारो को जवाब देना है। आवो साथ मिलकर देश को सहनसिल नहीं गतिसिल और विचारसिल बनाये। इस विचार को ज्यादा से ज्यादा फैलाये ये सिर्फ एक आर्टिकल नहीं देश की आवाज बन्नि चाहिये इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करे जिससे लोग एक दूसरे से जुड़ सके साथ मिलकर चले क्योंकि इसी से ही समाज बनता है और समाज से देश। और देश तब आगे बढेगा जब लोग एक दूसरे के बारेमे सोचे साथ दे। जिससे समाज में परिवर्तन होगा तभी तो देश में होगा
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