जानिए तोंद कम करने के 10 घरेलू उपचार।

जीवन मंत्र
अनियमित और मसालेदार भोजन के अलावा आरामपूर्ण जीवनशैली के चलते तोंद एक वैश्विक समस्या बन गई है जिसके चलते डायबिटीज और हार्टअटैक का खतरा बढ़ जाता है। तोंद कई अन्य रोगों को भी जन्म देती है। इसके चलते व्यक्ति हमेशा शरीर में अच्छा फिल नहीं कर पाता।
कमर और पेट के आसपास इकट्ठा हुई अतिरिक्त चर्बी से किडनी और मूत्राशय में भी दिक्कतें होना शुरू हो जाती हैं। रीढ़ की हड्डी पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ता है और जिसके चलते आए दिन कमर दर्द और साइड दर्द होता रहता है। अगर आप तोंद से छुटकारा पाकर फिर से उसे पेट बनाने की सोच रहे हैं तो यहां दिए जा रहे हैं 10 ऐसे उपाय जिसे करने में आपको अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ेगा। जरूरी नहीं कि सभी 10 उपाय आप आजमाएं। किसी भी एक उपाय को नियमित करें तो 1 माह में लाभ नजर आने लगेगा।
डाइट पर नियंत्रण : यह बहुत जरूरी है लेकिन कुछ लोगों के लिए यह बहुत कठिन टॉस्क है तो वे मानस‌िक उपाय करें। जब उनके सामने फैटी डाइट हो तो वे उससे होने वाले नुकसान के बारे में सोचें और अपनी तोंद को देंखे।ओवर इटिंग से बचना जरूरी है। कोई भी बहाना न बनाएं। खुद के साथ न्याय करें।
योगा टिप्स : प्रतिदिन अंग संचालन करें। सावधान की मुद्रा में खड़े रहकर दोनों हाथों की हथेलियों को कमर पर रखें फिर कमर को क्लॉकवाइज और एंटी-क्लॉकवाइज 10-10 बार घुमाएं।
नौकासन करें : नियमित रूप से यह आसन न सिर्फ पेट की चर्बी कम करने में मददगार है बल्कि शरीर को लचीला बनाने से लेकर पाचन संबंधी समस्याओं में यह काफी फायदेमंद साबित हुआ है।
बादम का सेवन : रोज बादाम का सेवन आपका वजन घटा सकता है। पुरड्यू यूनिव‌र्सिटी के शोध की मानें तो बादाम में मौजूद विटामिन ई और मोनोसैचुरेटेड फैट्स न सिर्फ शरीर में मौजूद सैचुरेटेड फैट्स को कम करने में मदद करता है बल्कि ओवर डाइटिंग से भी बचाता है। रोज हल्के भुने बादाम का सेवन बेहतरीन नाश्ता है जिसे लेने के बाद दिनभर स्नैक्स खाने का मन नहीं करता है, वहीं यह शरीर में गुड कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है।
उत्तान पादासन : यह एक ऐसा योग है जिसको नियमित करने से तुरंत ही पेट अंदर होने लगता है, खासकर वह अपच, कब्ज, मोटापा, तोंद और अन्य पेट संबंधी बीमारियों से बचाता है।
तोलांगुलासन : वजन तौलते वक्त दोनों तराजू संतुलन में रहते हैं अर्थात तराजू का कांटा बीचोबीच रहता है। उसी तरह इस योगासन में भी शरीर का संपूर्ण भार नितंब पर आ जाता है और व्यक्ति की आकृति तराजू जैसी लगती है इसीलिए इसे तोलांगुलासन कहते हैं।
ऊर्जा चल मुद्रा योग : ऊर्जा चल मुद्रा योग : मोटापा एक समस्या है। इससे पेट, पीठ, कमर और कंधे की समस्या भी बनी रहती है। मोटापे को दूर करने के लिए हम सबसे आसान उपाय बता रहे हैं ऊर्जा चल मुद्रा योग। दरअसल यह अंग संचालन (सूक्ष्म व्यायाम) का हिस्सा है।
कुर्मासन : कुर्मासन का अर्थ होता है कछुआ। इस आसन को करते वक्त व्यक्ति की आकृति कछुए के समान बन जाती है इसीलिए इसे कुर्मासन कहते हैं।
भुजंगासन : इस आसन में शरीर की आकृति फन उठाए हुए भुजंग अर्थात सर्प जैसी बनती है इसीलिए इसको भुजंगासन या सर्पासन कहा जाता है। यह आसन पेट के बल लेटकर किया जाता है। यह आसन भी पेट की चर्बी को घटाने के लिए किया जाता है।
योगा एक्सरसाइज: यदि आपका पेट थुलथुल हो रहा है, कमर मोटी हो चली है या पीठ दुखती रहती है, तो योग की यह हल्की-फुल्की एक्सरसाइज स्टेप बाई स्टेप करें। ‍इस एक्सरसाइज का नियमित अभ्यास करते रहने से निश्चित रूप से जहां पेट फ्लैट हो जाएगा, वहीं कमर भी छरहरी हो जाएगी।
शहद का सेवन : तोंद कम करने में शहद भी फायदेमंद होता है। शहद के कई गुण हैं। यह न सिर्फ मोटापा बढ़ाने, बल्कि मोटापा कम करने में भी कारगर है। आपको चाहिए कि आप रोजाना सुबह पानी के साथ शहद का सेवन करें। इससे आप शीघ्र ही कमर और पेट को कम करने में सफल होंगे।
आप चाहें तो सप्ताह में एक दिन तरल पदार्थ पर भी रह सकते हैं। इसमें आप नींबू पानी, दूध, ज्यूस, सूप इत्यादि चीजों को प्राथमिकता दें। आप चाहें तो एक दिन सलाद या फलाहार को भी दे सकते हैं। इसमें आप मात्र फल या सलाद ही खाएंगे। सलाद खाकर वजन घटाने में आपको मदद मिलगी। 
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क्या आप भी चाहते है भारत-पाकिस्तान का युद्ध! तो ये भी जरूर पढ़ ले।

उरी में सैन्य कैंप पर हुए हमले के बाद से ही लगातार इस बात पर चर्चा की जा रही है पाकिस्तान को युद्ध के मैदान में ही सबक सिखाना बेहतर विकल्प हो सकता है. केरल के कोज़ीकोड से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के युद्ध के बजाय गरीबी, बेरोजगारी से लड़ने के आह्वान के बावजूद अभी भी बहुत सारे लोगों को युद्ध का विकल्प ही ज्यादा कारगर नज़र आ रहा है.
अगर आप भी उन लोगों में से है जिन्हें लगता है की युद्ध ही अब इस समस्या का हल है तो आपको खुद को इन बातों के लिए भी तैयार रखना होगा, क्योकि युद्ध की स्थिति में इस तरह की परिस्थितियों से आपको दो चार होना पड़ सकता है:
जीडीपी में जबरदस्त गिरावट: अभी भारत की जीडीपी विकास की दर 8 फीसदी के करीब है और स्थिति सामान्य रही तो यह दर 2019 तक दोहरे अंको तक यानि 10 फीसदी के आस पास पहुँच सकती है. वहीँ युद्ध की स्थिति में जीडीपी में गिरावट दर्ज की जाएगी और यह हमें कम से कम 10 साल पीछे ढकेल देगी.
बढ़ेगी बेरोजगारी: जीडीपी में गिरावट का सीधा असर कंपनियों के लाभ की कमी के रूप में दिखेगा. जिसके बाद कंपनियों को अपने नुकसान को कम करने के उद्देस्य से कॉस्ट कटिंग कर के पूरी करनी होगी, जिसका सीधा मतलब नई नौकरियों का ना आना, कई लोगों के नौकरियों का जाना और कइयों की सैलरी में कटौती होना शामिल है. कुछ वैसा ही जैसा 2008 की मंदी के वक़्त देखने को मिला था.
विकास के पहिये पड़ेंगे सुस्त: 1999 में कारगिल युद्ध के समय एक हफ्ते तक युद्ध करने का खर्च तकरीबन 5000 करोड़ रुपये था. अब युद्ध होने की स्थिति में यह अनुमान लगाया जा रहा है यह खर्च प्रतिदिन 5000 करोड़ रुपये के करीब होगा. ऐसे में अगर यह युद्ध हफ्ते दस दिन भी चला तो भारत सरकार पर भारी आर्थिक दबाव पड़ेगा, और ऐसे में सरकार अपने खर्चे में कटौती करेगी जिसका सीधा असर जनकल्याण योजनाओं में कटौती के रूप में दिखाई दे सकता है.
बढ़ेगी महंगाई: अगर आपको लगता है कि दो सौ रुपये दाल और टमाटर के भाव बहुत ज्यादा थे तो हो सकता है युद्ध की स्थिति में जरुरी चीजों के दाम इससे भी अधिक इजाफा देखने को मिले. युद्ध का सीधा असर बढ़ती महंगाई के रूप में दिखाई देगा.
जवानों की शहादत के लिए रहना होगा तैयार: अगर उरी में 18 जवानों के शहीद होने पर आपका खून खौल रहा है तो यकीन मानिए की युद्ध की स्थिति में आपको अपने सैकड़ों-हजारों सैनिक खोने के लिए तैयार रहना पड़ेगा. आकड़ें बताते हैं कि अभी तक भारत पाकिस्तान में हुए तीन युद्धों में दोनों तरफ से 22,000 से भी ज्यादा सैनिक मारे गए हैं. और अभी युद्ध होने कि स्थिति में भयंकर जान माल के नुकसान का अनुमान है.
100 रुपये तक पहुँच सकता है एक डॉलर का भाव: अर्थव्यवस्था में सुस्ती का असर रुपये में गिरावट के रूप में भी दिखेगा. अनुमान है कि युद्ध कि स्थिति में रुपया लुढ़क कर 100 रुपए प्रति डॉलर के स्तर को छू लेगा. इसका मतलब होगा बाहर देशों से आयात करने वाली हर वस्तु महंगी हो जाएगी. ऐसी स्थिति में पेट्रोल डीजल के भाव भी आसमान पर पहुँच जाएंगे.
परमाणु हमले कि भी बनी रहेगी आशंका: भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणु हथियार संपन्न देश हैं. ऐसे में अगर भारत को युद्ध के मैदान में भारी पड़ता देख पाकिस्तान अपने परमाणु हथियार के इस्तेमाल की पहल करता है पूरे दक्षिण एशिया में भारी जानमाल का नुकसान देखने को मिलेगा.
क्या अभी भी आपको लगता है कि भारत को पाकिस्तान के साथ युद्ध करना चाहिए, अपनी राय हमें जरूर दे।
धन्यवाद।

जानिए आज़ादी के बाद भारत के विकास पर कर्जे के ऊपरी साये के बारेमे ?

हो सकता है कि आर्थिक मामलों पर केंद्रित यह आलेख आपको बहुत बोझिल लगे, लेकिन आप इसे अगर अर्थव्यवस्था की राजनीति के नज़रिए से देखने की कोशिश करेंगे, तो आप इन व्यापक प्रभावों को आसानी से समझ पायेंगे। बहरहाल इस विश्लेषण को पेश करने का मकसद आंकड़ों-सांख्यिकी की बौछार करना नहीं है। वास्तव में इसका मकसद मौजूदा संदर्भ में आम लोगों को, जो मानते हैं कि आर्थिक नीतियों से हमें क्या लेना देना, अर्थव्यवस्था के एक बेहद गंभीर पहलू से साक्षात्कार करवाना है।

हम सब लगातार आर्थिक विकास के पहलुओं के संदर्भ में सरकार के तरफ से एक वक्तव्य को बार-बार सुनते रहते हैं कि देश तरक्की कर रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि सड़कें बनी हैं, बिजली ज्यादा मिल रही है, अस्पताल भी ज्यादा बन गए हैं, इमारतें और भवन अब बहुतायत में हैं। अब सवाल यह है कि ये जो हासिल है, वह कैसे हासिल हुआ है? यह सब कुछ कितना स्थायी है? क्या एक व्यक्ति और सामाजिक प्राणी होने के नाते हम यह मानते हैं कि कर्ज़दार होकर सुविधाएं जुटा लेना एक अच्छी नीति है? कभी हमारी विकास दर 4 प्रतिशत हो जाती है, तो कभी 6 प्रतिशत, कभी 7 और 7.5 प्रतिशत। इसे ही वृद्धि दर (ग्रोथ रेट) भी कहा जाता है। वास्तव में यह वृद्धि दर होती क्या है?

अर्थव्यवस्था के सालाना आकार और स्वरूप का आकलन उस राशि से किया जाता है, जितना वित्तीय लेन-देन उस साल में किया गया; इसमें उत्पादन शामिल है। दूसरे रूप में कहें तो सभी तरह के सामानों और वस्तुओं की खरीद-बिक्री, सेवाओं के शुल्क (वकील, डॉक्‍टर, नल सुधरवाने, परामर्श लेने आदि), परिवहन, कृषि, उद्योग, खनन, बैंकिंग सरीखे क्षेत्रों में जितना लेन-देन का व्यापार होता है, उस राशि को जोड़कर यह देखा जाता है कि देश में कुल कितनी राशि का आर्थिक व्यवहार हुआ, यह उस साल का सकल घरेलू उत्पाद (यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट-जीडीपी) माना जाता है।

इस साल का जीडीपी पिछले साल के जीडीपी से कितना ज्यादा हुआ, उस अंतर को ही जीडीपी में वृद्धि के तौर पर पेश किया जाता है। इस परिभाषा में यह तो देखा जाता है कि दवाईयों और अस्पतालों का बाज़ार कितना बढ़ा, किन्तु यह नहीं देखा जाता है कि लोगों का स्वास्थ्य कितना बेहतर हुआ। अब यदि लोगों का स्वास्थ्य बेहतर होगा तो संभव है कि दवाइयों और अस्पतालों का बाज़ार कम होता जाएगा। यदि ऐसा हुआ, तो जीडीपी में कमी आएगी, जिसे हमारी मौजूदा आर्थिक नीतियों और वृद्धि दर के नज़रिए से नकारात्मक माना जाएगा।

यही बात खनन पर भी लागू होती है। हम कुदरत के शरीर को यानी पहाड़ों, नदियों, जंगलों, मिट्टी को जितना ज्यादा खोदेंगे या उसका शोषण करेंगे, उतने समय के लिए “धन का आगमन” ज्यादा होगा। तब हम मानते हैं कि अपनी संपत्ति बढ़ गयी है। आंकड़े भी यही दिखाने लगते हैं, किन्तु “निजी सम्पत्ति” बढ़ाने के लिए हमने कितनी “प्राकृतिक सम्पदा” का विनाश किया, यह आर्थिक विकास के पैमानों में दर्ज नहीं होता है।

हमारे सामने चुनौती यह है कि दुनिया भर में आर्थिक विकास को ही जनकल्याण और मानवता का पैमाना माने जाने से इनकार किया जा रहा है, किन्तु हम, भारत के लोग अभी भी ऐसे विकास के लिए लाइ-लप्पा हुए जा रहे हैं, जो बीमारी बढ़ाता है। यह केवल शरीर की बीमारी नहीं बढ़ा रहा है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक और संरचनात्मक बीमारियों को नया मुकाम दे रहा है।

हम यह नहीं सोच पा रहे हैं कि वृद्धि दर को विकास दर नहीं माना जाना चाहिए। वृद्धि दर केवल अर्थव्यवस्था के आकार को सांकेतिक रूप में प्रस्तुत करने के लिए गढ़ी गयी अवधारणा है। जबकि विकास को मापने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक-लैंगिक बराबरी, सामाजिक समरसता, शांति, संसाधनों का समान वितरण सरीखे पहलुओं का संज्ञान लिया जाना अनिवार्यता होती है। हम किसी भी स्तर पर उस अनिवार्यता का पालन नहीं करते हैं।
हमारे पिछड़ेपन का स्तर यह है कि अब तक इन मानकों के आधार पर मानवीय विकास को हर साल मापने का कोई पैमाना हम विकसित ही नहीं कर पाये हैं। यही कारण है कि भारत में पोषण और स्वास्थ्य से संबंधित अखिल-भारतीय आंकड़े 8 से 10 साल में एक बार जारी होते हैं। मातृत्व मृत्यु के स्तर को 5 से 6 साल में एक बार जांचा जाता है। शिशु मृत्यु दर के आंकड़े 2 से ज्‍यादा साल देरी से आते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानवीय विकास के इन सूचकों का कोई खास महत्व “वृद्धि दर” में होता नहीं है।

हाल ही में बताया गया कि भारत अब भी उन देशों की सूची में शामिल है, जहां आर्थिक विकास की दर ज्यादा बनी हुई है। हम चीन से भी तेज गति से विकास कर रहे हैं। हम एक आर्थिक महाशक्ति हैं। कभी यह भी तो सोचना चाहिए कि पिछले 2-3 दशकों से हम जिन प्राकृतिक संसाधनों का “वहशियाना ढंग से दोहन” कर रहे हैं, वह इस “विकास” के चलते अगले 35 से 45 सालों में लगभग खतम हो जाएगा;तब क्या करेंगे? क्या विकास का जीवन केवल मानवों की एक पीढ़ी के बराबर होना चाहिए?

अब तक की बात आपको आदर्शवाद पर केंद्रित वक्तव्य लगा होगा। अब जरा इस बात पर गौर कीजिये कि हम जो विकास कर रहे हैं, यह तो तय है कि उसमें गरिमा और समानता तो नहीं ही है, किन्तु क्या उसमें आत्मनिर्भरता का एक भी अंश है? स्वतंत्रता के बाद देश के विकास के लिए सरकारों ने नीति का मार्ग अपनाया। विकास की नीति का मतलब होता है उपलब्ध संसाधनों (मानवीय-प्राकृतिक) का जिम्मेदार और जवाबदेय उपयोग करते हुए सम्मानजनक-गरिमामय और अपनी क्षमता का अधिकतम उपयोग करने की सामाजिक-आर्थिक-राजनीति स्थिति को हासिल करना; लेकिन क्या भारत ने ऐसी ही किसी सोच को अपनाया है? जवाब है – नहीं। वास्तव में अपने दैनिक जीवन की जरूरतों का विस्तार करते हुए हम इतना आगे बढ़ गए कि भारत को “कर्जे की अर्थव्यवस्था” को “विकास की अर्थव्यवस्था” के कपड़े पहनाना पड़े।

स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1950-51 में भारत की सरकार पर कुल 3059 करोड़ रुपये का कर्जा था। जानते हैं वर्ष 2016-17 के बजट के मुताबिक भारत सरकार पर कुल कितना कर्जा है? यह राशि है 74.38 लाख करोड़ रुपये; सरकार पर अपने बजट से साढ़े तीन गुना ज्यादा कर्जा है।

पिछले 66 सालों में भारत की सरकार पर जमे हुए कर्जे में 2431 गुने की वृद्धि हुई है। और यह लगातार बढ़ता गया है। हमें यह भी सोचना चाहिए कि यह कर्ज आगे न बढ़े और इसका चुकतान भी किया जाना शुरू किया जाए। जिस स्तर पर यह राशि पहुंच गयी है, वहां से इसमें कमी लाने के लिए देश के लोगों को कांटे का ताज पहनना पड़ेगा। सवाल यह है कि जब इतनी बड़ी मात्रा में कर्जा बढ़ा है, तो क्या लोगों की जिंदगी में उतना ही सुधार आया?

आंकड़े तो ऐसा नहीं बताते हैं। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 1950-51 में चालू कीमतों के आधार पर प्रतिव्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 274 रुपये थी। जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 93,231 रुपये हो गई। यह वृद्धि है 340 गुने की। क्या इसका मतलब यह है कि जितना कर्जा सरकारों ने लिया, उसने बहुत उत्पादक भूमिका नहीं निभाई है। सरकार का पक्ष है कि देश में अधोसंरचनात्मक ढांचे के विकास, परिवहन, औद्योगिकीकरण, स्वास्थ्य, कीमतों को स्थिर रखने और विकास-हितग्राहीमूलक योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए उसे कर्जा लेना पड़ता है।

“वृद्धि दर को विकास दर” मानने वाले नज़रिए से यह तर्क ठीक हो सकता है, किन्तु जनकल्याणकारी और स्थायी विकास के नज़रिए से इस तर्क की उम्र बहुत ज्यादा नहीं होती है क्योंकि कर्जा लेकर शुरू किया गया विकास एक दलदल की तरह होता है, जिसमें एक बार आप गलती से या अपनी उत्सुकता को शांत करने के लिए उतरते हैं, और फिर उसमें डूबते ही जाते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर कोई 6 से 8 प्रतिशत के बीच रहती है, किन्तु लोकऋण (केंद्र सरकार द्वारा लिए जाने वाला क़र्ज़) की वृद्धि दर 12 प्रतिशत प्रतिवर्ष है। यह बात दिखाती है कि एक तरफ तो प्राकृतिक संसाधनों का जो दोहन हो रहा है, वह समाज-मानवता के लिए दीर्घावधि के संकट पैदा कर रहा है, उस पर भी उसका लाभ समाज और देश को नहीं हो रहा है। उस दोहन से देश के 100 बड़े घराने अपनी हैसियत ऐसी बना रहे हैं कि वे समाज को अपना आर्थिक उपनिवेश बना सकें। इसमें एक हद तक वे सफल भी रहे हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि आर्थिक उपनिवेश बनते समाज को विकास होने का अहसास करवाने के लिए सरकार द्वारा और ज्यादा कर्जे लिए जा रहे हैं। हमें इस विरोधाभास को जल्दी से जल्दी समझना होगा और विकास की ऐसी परिभाषा गढ़ना होगी, जिसे समझाने के लिए सरकार और विशेषज्ञों की आवश्‍यकता न पड़े। लोगों का विकास होना है तो लोगों को अपने विकास की परिभाषा क्यों नहीं गढ़ने दी जाती है?

आर्थिक विकास की मौजूदा परिभाषा बहुत गहरे तक फंसाती है। यह पहले उम्मीद और अपेक्षाएं बढ़ाती है, फिर उन्हें पूरा करने के लिए समाज के बुनियादी आर्थिक ढांचे पर समझौते करवाती है, शर्तें रखती और समाज के संसाधनों पर एकाधिकार मांगती है। इसके बाद भी मंदी आती है और उस मंदी से निपटने के लिए और रियायतें मांगती है; तब तक राज्य और समाज इसमें इतना फंस चुका होता है कि वह बाज़ार की तमाम शर्तें मानने के लिए मजबूर हो जाता है क्योंकि तब तक उत्पादन, जमीन, बुनियादी सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों पर निजी ताकतों का कब्ज़ा हो चुका होता है।

जरा इस उदाहरण को देखिये। वर्ष 2008 में, जब वैश्विक मंदी का दौर आया तब भारत के बैंकों के खाते में 53,917 हज़ार करोड़ रुपये की “अनुत्पादक परिसंपत्तियां” (नान परफार्मिंग असेट) दर्ज थीं। ये वही कर्जा होता है, जिसे चुकाया नहीं जा रहा होता है या समय पर नहीं चुकाया जाता है। तब यह नीति बहुत तेज़ी से आगे बढ़ी कि मंदी से निपटने के लिए बैंकों से ज्यादा से ज्यादा ऋण दिए जाएं। यह कभी नहीं देखा गया किजो ऋण दिया जा रहा है, वह कितना उत्पादक, उपयोगी और सुरक्षित होगा। वर्ष 2011 से जो ऋण बंटे, उनमें से बहुत सारे अनुत्पादक साबित हुए।

सितंबर 2015 की स्थिति में बैंकों के खाते में 3.41 लाख करोड़ रुपये की “अनुत्पादक परिसंपत्तियां” दर्ज हो गईं। अब इस खाते की राशि, यानी जो ऋण वापस नहीं आ रहा है, को सरकारी बजट से मदद लेकर बट्टे खाते में डालने की प्रक्रिया शुरू हो गयी या उन पर समझौते किये जा रहे हैं। इस तरह की नीतियों ने भारत सरकार के आर्थिक संसाधनों के दुरुपयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इनके कारण भी सरकार ने नया कर्जा लेने की प्रक्रिया जारी रखी।

पिछले 66 साल का आर्थिक नीतियों का अनुभव बताता है कि भारत की प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 340 गुना बढ़ी है, किन्तु लोक ऋण के ब्याज के भुगतान में 11349 गुना वृद्धि हुई है। कहीं न कहीं यह देखने की जरूरत है कि लोक ऋण का उपयोग संविधान के जनकल्याणकारी राज्य के सिद्धांत को मजबूत करने के लिए हो रहा है या नहीं? यह पहलू तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश में 3 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हों और 20 करोड़ लोग हर रोज भूखे रहते हों।

Thanks
Vikas jain (ndtv)

लाइफ बर्बाद कर रहा है व्हाट्सएप! (Whatsapp)

नीला टिक
कभी संदेह होने पर भी कोई इसलिए अपनी प्रेमिका को माफ कर देता था कि शायद उसने उसका मैसेज नहीं पढ़ा होगा इसलिए उसका जवाब नहीं दिया। परंतु नीले टिक के जन्म के बाद से यह संदेह भी खत्म हो चुका है। चूंकि नीले टिक का मतलब है मैसेज पढ़ा जा चुका है और पढ़ने के बाद जवाब न देना यानि माफी की संभावना भी खत्म।
लास्ट सीन
आप अपने जीवनसाथी के साथ रात को सोने के लिए तैयार हो रहे हैं तभी एक मैसेज आता है जोकि आपके पुराने सहपाठी का है। फिर दोनों में संदेशों का आदान-प्रदान चल पड़ता है। और आपका साथी यह सोचकर परेशान हैरान हो जाता है कि जब वह सोने गई तो फिर आॅनलाइन क्यों है।
लास्ट सीन को छिपाना
आप उपर्युक्त समस्या से छुटकारा पाने के लिए अपने लास्ट सीन को छिपाते हैं लेकिन इससे समस्या कम होने की जगह और बढ़ जाती है। चूंकि लास्ट सीन छिपाने के बाद आप दूसरों के लास्ट सीन भी नहीं देख पाते। इससे रहस्य और अटकलों का बाजार और अधिक गरम हो जाता है।
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बातचीत का अंत ”K” से
ओके या के शब्द अच्छा है। इसका मतलब है मैं समझ गया या मैं आपसे सहमत हूं। पर वाट्सएप का ”K” भाषा का ही नहीं लोगों की भावनाओं का भी हत्यारा साबित होता है। चूंकि इसके उपयोग से लोग आपको असभ्य समझने लगते हैं।

ग्रुप और मैसेज
आप भी वाट्सएप के अनेक गु्रप्स से जुड़े होंगे। इसके बाद आपको झेलने पड़ते हैं अनेकों बेमतलब के मैसेज। न चाहकर भी इनका जवाब देना होता है। और अगर नहीं देते तो दूसरों की टिप्पणियां सहनी पड़ती हैं।
देख सकते हैं लेकिन महसूस नहीं कर सकते
वाट्सऐप पर आप मैसेजों के आदान-प्रदान के संदेशों को मोबाइल की स्क्रीन पर देख तो सकते हैं लेकिन दूसरे के भाव, मुस्कान, आंसू आदि को महसूस नहीं कर सकते। दूसरे का हाथ पकड़कर अपने भावनाओं का अहसास नहीं करवा सकते। दुर्भाग्य से यह आज का सबसे बड़ा सच है।
आत्म ग्लानियुक्त प्रसन्नता
आपका अपने साथी से झगड़ा होता है तो आप महसूस करते हैं कि ऐसे कंधे हों जिसपर आप सिर रखकर रोक सके। कोई आपको ढांढस बंधाए। यकीन माने कि आॅनलाइन की इस दुनिया में ऐसा कोई भी साधन उपलब्ध नहीं है। 

अमूल डेयरी के जन्म की कहानी (Amul Dairy)

Amul Dairy
परिचय
अमूल भारत का एक दुग्ध सहकारी आन्दोलन है। यह एक ब्रान्ड नाम है जो गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन संघ लिमिटेड नाम की सहकारी संस्था के प्रबन्धन में चलता है। गुजरात के लगभग 26 लाख दुग्ध उत्पादक सहकारी दुग्ध विपणन संघ लिमिटेड के अंशधारी (मालिक) हैं।
अमूल, संस्कृत के अमूल्य का अपभ्रंश है; अमूल्य का अर्थ है – जिसका मूल्य न लगाया जा सके। अमूल, गुजरात के आणंद नामक नगर में स्थित है। यह सहकारी आन्दोलन की दीर्घ अवधि में सफलता का एक श्रेष्ठ उदाहरण है और विकासशील देशों में सहकारी उपलब्धि के श्रेष्ठतम उदाहरणों में से एक है। अमूल ने भारत में श्वेत क्रान्ति  की नींव रखी जिससे भारत संसार का सर्वाधिक मात्रा वाला दुग्ध उत्पादक देश बन गया। अमूल ने ग्रामीण विकास का एक सम्यक मॉडल प्रस्तुत किया है।

अमूल (आणंद सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ) की स्थापना 
14 दिसंबर,1946 में एक डेयरी यानी दुग्ध उत्पाद सहकारी आंदोलन के रूप में हुई थी। इसे गुजरात सहकारी दुग्ध वितरण संघ के द्वारा प्रचारित और प्रसारित किया गया। अमूल के प्रमुख उत्पाद हैं: दूध, दूध का पाउडर, मक्खन, घी, चीज़,पनीर, दही, चॉकलेट, श्रीखण्ड, आइसक्रीम, गुलाब जामुन, न्यूट्रामूल आदि।

अमूल डेयरी के जन्म की कहानी
किसानों की जिन्दगी गुजरात के खेडा जिले में बहुत ही मुश्किल और दयनीय हुआ करती थी जैसे भारत के कुछ हिस्सों में अभी भी है। फिर उनकी मेहनत का जो पैसा हुआ करता था वह कमीशन की तरह दलाल खा जाया करते थे। इस मुश्किल  को कम करने के लिए किसानों ने सोचा कि हम खुद अपना उत्पादन करें और फिर उसको जाकर बाजार में बेचें। इस क्रान्तिकारी सोच ने ही अमूल को जन्म दिया।
अमूल तब शुरू हुआ था जब हमारा देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे  दूरदर्शी और क्रान्तिकारी नेता ने सोचा कि  किसानों को आर्थिक मजबूती तभी प्रदान की जा सकती है जब वे दलालों की मजबूत पकड़ से बाहर आ सकेंगे। 4 जनवरी 1946 में स्मारखाँ (खेडा जिला) गुजरात में एक मीटिंग में इस पर विचार किया गया कि हमको सहयोगी गाँवों में दुग्ध उत्पादन केंद्र  बनाने चाहिए। फिर पहली सहकारी संस्था आनंद में बनाई गई जहाँ छोटे किसानों ने साथ में आकर हाथ मिलाया और एक गाँव का एक सहकारी समूह तैयार किया जिसने अमूल के नाम से पूरे देश में सफलता प्राप्त की। इसका पंजीकरण दिसम्बर 1946 में किया गया और फिर मुम्बई योजना के अन्दर दुग्ध उत्पादन की सप्लाई 1948 में शुरू की गई। 1973 में यह गुजरात सहकारी दुग्ध मार्केटिंग फ़ेडरेशन लि. में तबदील हो चुकी थी और अमूल के नाम से लोकप्रिय हुई।

अमूल के काम का मॉडल
अमूल 6 मिलियन लीटर दूध रोज 10,755 गाँवों से एकत्रित करता है और ये गाँव पूरे गुजरात में फैले हुए हैं। लोगों तक एक अच्छा उत्पाद पहुँचाने के लिए अमूल द्वारा इसमें एक 3 टीयर मॉडल का इस्तेमाल किया जाता था – जिसमें पहले गाँव में एक संस्था से दूध लिया जाता था (जो प्राइमरी प्रोडयूसर हुआ करते थे)। फिर यह दूध जिले के सहयोगी दुग्ध भंडार के पास जाता था। वे दूध को पर्याप्त तापमान पर रखते थे और उसको रखने के लिए उसमें रासायनिक पदार्थ डाले जाते थे और फिर तीसरे चरण में वह दूध फेडरेशन (जो दूध की प्रोसेसिंग और उसको बाजार में बेचने का काम करता था) तक पहुँचता था। इस माडल में से दलाल/ बिचौलिए को पूरी तरह हटाया जा चुका था और यही गाँव के लोगों के मुनाफ़े का स्रोत बना।

सहकारी समिति (cooperative sociaty) के बारेमे जानने यहाँ क्लिक करे

एक क्रांतिकारी परिवर्तन
अपनी एक मीटिंग में अमूल के चेयरमैन वी. कुरियन ने कहा – “सहयोग से काम करना और सबके साथ काम करना” उनकी सबसे पहली सोच है । यह उन इंसानों का विश्वास है कि जब लोग साथ में काम करते हैं तो वे अपने खुद के बारे में कम सोचते हैं और अपनी टीम के बारे में ज़्यादा सोचते हैं। इसी सोच ने यह चमत्कार और जादू कर दिखाया है कि अमूल कम्पनी आर्थिक और व्यापारिक रूप से एक मजबूत कम्पनी बन गयी।
        
2004 तक अमूल 20 लाख  किसानों का, जो पूरे गुजरात में फैले हुए थे, रोज़ी- रोटी का बहुत बड़ा ज़रिया बना हुआ था और ग्राहकों को भी कम पैसों में एक अच्छा उत्पाद पहुँचता था। बाजार में इतनी प्रतिस्पर्धा के होते हुए भी ब्रांड अमूल हर रोज सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित करता रहा। इसमें उनकी पैकेजिंग तकनालोजी और नई तकनीकें अपनाने का राज़ था। अमूल की केंद्रीय टीम आज भी वही है जो पहले हुआ करती थी और विज्ञापन एजेंसी भी वही है उसमें भी कोई बदलाव लाया नहीं गया।

अमूल पूरे देश  की पहचान बन गया है। अमूल का “ Utterly Butterly campaign”  सबसे ज्यादा चलने वाला विज्ञापन था और इसको गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड  में भी शामिल किया गया था क्योंकि कम्पनी का मानना था कि हम एक बहुत  ‘‘सीधी, आसान, एक नई सोच के साथ और  अपने ग्राहकों को एक सा उत्पाद प्रदान करने वाली कम्पनी  हैं। “ अमूल ने कभी कोई बड़ी अभिनेत्री को अपने विज्ञापन में इस्तेमाल नहीं किया  क्योंकि वह अपने आप को आम आदमी से जोड़ना चाहते थे। अमूल की सफलता उसकी सोच और उसकी मार्केटिंग पर रही जिसमें उसने ऐसे उत्पाद बनाए जहाँ भारतीय या गाँव के लोगों को एहसास था कि अगर हम अपने घरों  में भी दूध मक्खन का उत्पादन करेंगे तो हमको इससे सस्ता नहीं पड़ने वाला। लोगों  को उन पर एक विश्वास था कि अगर यह हमारे जैसे किसानों के घरों से ही निकल कर बाजार में उपलब्ध हो रहा है तो यह गलत चीज़ नहीं हो सकती। आज पूरे देश में अमूल के 50 विक्रय कार्यालय हैं, 3000 थोक डीलर्स  और 5,000 से भी ज्यादा  खुदरा विक्रेता हैं।

सहकारी समिति (cooperative sociaty)

सहकारी समिति
सहकारी समिति (cooperative) लोगों का ऐसा संघ है जो अपने पारस्परिक लाभ (सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक) के लिए स्वेच्छापूर्वक सहयोग करते हैं।

परिचय:
औद्योगिक क्रांति के कारण आर्थिक तथा समाजिक असंतुलन के परिणाम स्वरूप भारत में सहकारी आंदोलन की शुरूआत हुई। पूँजीवादी देश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जापान और समाजवादी देश दोनों प्रकार के देशों में सहकारी समितियों ने विशेष स्थान बनाया है।

‘सहकारी’ शब्द का अर्थ है-
‘साथ मिलकर कार्य करना’। इसका अर्थ हुआ कि ऐसे व्यक्ति जो समान आर्थिक उद्देश्य के लिए साथ मिलकर काम करना चाहते हैं वे समिति बना सकते हैं। इसे ‘सहकारी समिति’ कहते हैं। यह ऐसे व्यक्तियों की स्वयंसेवी संस्था है जो अपने आर्थिक हितों के लिए कार्य करते हैं। यह अपनी सहायता स्वयं और परस्पर सहायता के सिद्धान्त पर कार्य करती है। सहकारी समिति में कोई भी सदस्य व्यक्तिगत लाभ के लिए कार्य नहीं करता है। इसके सभी सदस्य अपने-अपने संसाधनों को एकत्रा कर उनका अधिकतम उपयोग कर कुछ लाभ प्राप्त करते हैं, जिसे वह आपस में बांट लेते हैं।

सहकारी समिति, संगठन का एक प्रकार है जिसमें व्यक्ति अपनी इच्छा से, समानता के आधार पर अपने आर्थिक हितों के लिए मिलकर कार्य करते हैं। उदाहरणार्थ, एक विशेष बस्ती के विद्यार्थी विभिन्न कक्षाओं की पुस्तकें उपलब्ध कराने हेतु एकत्रा होकर एक सहकारी समिति बनाते हैं। अब वे प्रकाशकों से सीधे ही पुस्तकें क्रय करके विद्यार्थियों को सस्ते दामों पर बेचते हैं। क्योंकि वे सीधे प्रकाशकों से ही पुस्तकें क्रय करते हैं इसलिए मध्यस्थों के लाभ का उन्मूलन होता है।

सहकारी समितियों की विशेषताएँ

स्वैच्छिक संस्था :
एक सहकारी समिति व्यक्तियों की एक स्वैच्छिक संस्था है। एक व्यक्ति किसी भी समय सहकारी समिति का सदस्य बना सकता है, जब तक चाहे उसका सदस्य बना रह सकता है और जब चाहे सदस्यता छोड़ सकता है। पपद्ध खुली सदस्यता : सहकारी समिति की सदस्यता समान हितों वाले सभी व्यक्तियों के लिए खुली होती है। जाति, लिंग, वर्ण अथवा र्ध्म के आधर पर सदस्यता प्रतिबंध्ति नहीं होती, परन्तु किसी विशेष संगठन के कर्मचारियों की संख्या के आधार पर सीमित हो सकती है।

पृथक वैधानिक इकाई :
एक सहकारी उपक्रम को ‘सहकारी समिति अधिनियम 1912’ अथवा राज्य सरकार के संबंद्ध सहकारी समिति अधिनियम के अंतर्गत पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। एक सहकारी समिति का अपने सदस्यों से पृथक वैधनिक अस्तित्व होता है।

वित्तीय स्रोत :
सहकारी समिति में पूंजी सभी सदस्यों द्वारा लगाई जाती है। इसके अलावा, पंजीकरण के बाद समिति ऋण ले सकती है। सरकार से अनुदान भी प्राप्त कर सकती है।

सेवा उद्देश्य :
एक सहकारी समिति का प्राथमिक उद्देश्य अपने सदस्यों की सेवा करना है, यद्यपि यह अपने लिए उचित लाभ भी अर्जित करती है। अपद्ध मताध्किर : एक सदस्य को केवल एक मत देने का अधिकर होता है चाहे उसके पास कितने ही अंश हो।

सहकारी समितियों के प्रकार:
सहकारी समितियों का वर्गीकरण उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं की प्रकृति के आधार पर किया जा सकता है। सहकारी समितियों के मुख्य प्रकार निम्नलिखित हैं :

उपभोक्ता सहकारी समितियाँ :
उपभोक्ताओं को यह उचित मूल्य पर उपभोक्ता वस्तुएं उपलब्ध करवाती हैं। ये समितियां आम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए बनाई जाती हैं। ये सीधे उत्पादकों और निर्माताओं से माल खरीद कर वितरण श्रृंखला से मध्यस्थों का उन्मूलन कर देती है। इस प्रकार माल के वितरण की प्रक्रिया में मध्यस्थों का लाभ समाप्त हो जाता है और वस्तु कम मूल्य पर सदस्यों को मिल जाती हैं। कुछ सहकारी समितियों के उदाहरण हैं- केन्द्रीय भंडार, अपना बाजार, सुपर बाजार आदि।

उत्पादक सहकारी समितियाँ :
ये समितियां छोटे उत्पादकों को उत्पादन के लिए कच्चा माल, मशीन, औजार, उपकरण आदि की आपूर्ति करके उनके हितों की रक्षा के लिए बनाई जाती है। हरियाणा हैंडलूम, बायानिका, एपको ;। च्च्ब्व्द्ध आदि उत्पादक सहकारी समितियों के उदाहरण हैं।

सहकारी विपणन समितियाँ :
ये समितियां उन छोटे उत्पादकों और निर्माताओं द्वारा बनाई जाती हैं, जो अपने माल को स्वयं बेच नहीं सकते। समिति सभी सदस्यों से माल इकट्ठा करके उसे बाजार में बेचने का उत्तरदायित्व लेती है। अमूल दुग्ध पदार्थों का वितरण करने वाली गुजरात सहकारी दुग्ध वितरण संघ लिमिटेड ऐसी ही सहकारी विपणन समितियाँ है।

सहकारी वितीय समितियाँ :
इस प्रकार की समितियों का उद्देश्य सदस्यों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है। समिति सदस्यों से धन इकट्ठा करके जरूरत के समय उचित ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराती है। ग्राम सेवा सहकारी समिति और शहरी सहकारी बैंक, सहकारी ऋण समिति के उदाहरण हैं।

सहकारी सामूहिक आवास समितियाँ :
ये आवास समितियाँ अपने सदस्यों को आवासीय मकान उपलब्ध कराने हेतु बनाई जाती हैं। ये समितियाँ भूमि क्रय करके मकानों अथवा फ्लैटों का निर्माण कराती हैं तथा उनका आबंटन अपने सदस्यों को करती हैं।

सहकारी समिति के लाभ:
व्यावसायिक संगठन के सहकारी स्वरूप के निम्नलिखित लाभ हैं :

स्वैच्छिक संगठन :
यह एक स्वैच्छिक संगठन है जो पूँजीवादी तथा समाजवादी, दोनों प्रकार के आर्थिक तंत्रों में पाया जाता है।

लोकतांत्रिक नियंत्राण :
एक सहकारी समिति का नियंत्राण लोकतांत्रिक तरीके से होता है। इसका प्रबंधन लोकतांत्रिक होता है तथा ‘एक व्यक्ति-एक मत’ की संकल्पना पर आधरित होता है।

खुली सदस्यता :
समान हितों वाले व्यक्ति सहकारी समिति का गठन कर सकते हैं। कोई भी सक्षम व्यक्ति किसी भी समय सहकारी समिति का सदस्य बन सकता है और जब चाहे स्वेच्छा से समिति की सदस्यता को छोड़ भी सकता है।

मध्यस्थों के लाभ का उन्मूलन :
सहकारी समिति में सदस्य उपभोक्ता अपने माल की आपूर्ति पर स्वयं नियंत्राण रखते हैं, क्योंकि माल उनके द्वारा सीधे ही विभिन्न उत्पादकों से क्रय किया जाता है। इसलिए इन समितियों के व्यवसाय में मध्यस्थों को मिलने वाले लाभ का कोई स्थान नहीं रहता।

सीमित देनदारी :
सहकारी समिति के सदस्यों की देनदारी केवल उनके द्वारा निवेशित पूंजी तक ही सीमित है। एकल स्वामित्व व साझेदारी के विपरीत सहकारी समितियों के सदस्यों की व्यक्तिगत सम्पत्ति पर व्यावसायिक देनदारियों के कारण कोई जोखिम नहीं होता।

स्थिर जीवन :
सहकारी समिति का कार्य काल दीर्घ अवधि् तक स्थिर रहता है। किसी सदस्य की मृत्यु, दिवालियापन, पागलपन या सदस्यता से त्यागपत्रा देने से समिति के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।