शनिवार और मंगलवार को करे ये उपाय, दूर होंगी परेशानिया!

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हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार शनिदेव व भगवान हनुमान की आराधना से दुनिया का हर सुख प्राप्त किया जा सकता है। जहां शनि अच्छे कर्मों का फल देकर भक्त पर कृपा करते हैं, तो वहीं श्रीहनुमान की कृपा बल, बुद्धि, ज्ञान व सफलता के रूप में मिलती है।
शनिवार व मंगलवार शनि और हनुमान दोनों ही देवताओं की भक्ति के विशेष दिन माने गए हैं। इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से दोनों ही देवताओं की कृपा प्राप्त हो सकती है। जानिए शनिवार व मंगलवार को कैसे पाएं शनिदेव व हनुमानजी का आशीर्वाद-
1. शनिवार व मंगलवार को सुबह-शाम स्नान के बाद नवग्रह मंदिर में शनि व श्रीहनुमान की जल स्नान व विशेष सामग्रियों से पूजा करें।
2. पूजा में शनिदेव को गंध, अक्षत, फूल, तेल, तिल, काले वस्त्र तो श्रीहनुमान को सिंदूर, लाल चंदन, फूल, अक्षत व लाल वस्त्र चढ़ाएं।
3. शनिदेव को तिल के व्यंजन तो हनुमान को गुड़ के पकवान का भोग लगाएं।
4. शनिदेव व हनुमानजी के सरल मंत्रों का जाप कम से कम एक माला यानी 108 बार करें।
5. पूजा व मंत्र जाप के बाद हनुमानजी व शनिदेव की धूप व दीप आरती कर सफलता व सौभाग्य की कामना करें।
श्रीहनुमान ध्यान मंत्र
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।
हनुमान ध्यान मंत्र के बाद इन आसान हनुमान नाम मंत्रों का सुख-समृद्धि की कामना से स्मरण करें-
1. ॐ बलसिद्धिकाय नम:।
2. ॐ सर्वबन्धविमोक्त्रे नम:।
3. ॐ सर्वदु:खहराय नम:।
शनि स्मरण मंत्र
नीलाञ्जनं समाभासं रविपुत्रं विनायकम्।
छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।
शनि स्मरण मंत्रों के बाद इन नाम मंत्रों का भी ध्यान करें सुख-सौभाग्य की कामना से करें-
1. ॐ दीनार्तिहरणाय नम:।
2. ॐ दैन्यनाशकराय नम:।
3. ॐ भानुपुत्राय नम:।
Jivan upyogi batain
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जडेजा का संघर्ष, 10 रूपये रोजाना पर जिए और पूरा किया मां का सपना।

कई लोग सपना देखते है कुछ बनने का Success होने का और अपनी मेहनत और लगन के दम पर वह सफल होते भी है। आज बात करेंगे ऐसे ही सौराष्ट्र के लड़के के यानि रविंद्र जडेजा के बारेमे।
जडेजा ने काफी संघर्ष कर सफलता हासिल की है। एक समय था जब उन्हें रोज के खर्चे के लिए केवल 10 रूपये मिलते थे। क्रिकेट खेलने के लिए उनकी दीवानगी इतनी ज्यादा थी कि वे नींदों में भी क्रिकेट की बातें करते थे।
जडेजा को क्रिकेटर बनाने में उनकी मां का बड़ा योगदान था लेकिन जब जडेजा को टीम इंडिया में जगह मिली तो वे इस दुनिया में नहीं थीं। उनकी मां नर्स थी और पिता वॉचमैन थे, इसके चलते उनका परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था लेकिन जडेजा ने अपनी जिद के बूते क्रिकेट को अपना कॅरियर बनाया। जडेजा का जन्म गुजरात के जामनगर जिले के नवगाम खेड में छह दिसंबर 1988 को हुआ। उनके पिता अनिरूद्ध सिंह सेना में थे लेकिन एक इंजरी के चलते उन्हें फौज छोड़नी पड़ी और सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करनी पड़ी। उनकी मांग लता नर्स थी।
नींदों में भी देखते थे Cricketer बनने का सपना।
जडेजा क्रिकेट को लेकर काफी पैशनेट थे और नींदों में भी पकड़ो, फेंकों बोलते रहते थे। इस पर उनके पिता उन्हें पूर्व क्रिकेटर महेन्द्र सिंह चौहान के पास ले गए। हालांकि उनके पिता चाहते थे रवीन्द्र जडेजा सेना में जाए लेकिन पत्नी लता के कहने पर उन्होंने यह मंशा छोड़ दी।
उनके पिता बताते हैं कि मैं रवीन्द्र को एक आर्मी ऑफिसर के रूप में देखना चाहता था लेकिन उसने क्रिकेट को चुना। मैंने उसे कहाकि जो करना है उसे बेस्ट करो वर्ना ना ऑफिसर बन पाएगा और ना क्रिकेटर। जडेजा अपनी मां के काफी करीब थे और जब उनका निधन हुआ तो वे काफी टूट गए। उन्होने क्रिकेट छोड़ने का फैसला कर लिया था लेकिन अपनी बड़ी बहन के कहने पर उन्होंने खुद को संभाला। मां के निधन के बाद बहन ने ही जडेजा को सहारा दिया। जिस साल उनकी मां का निधन हुआ उसी साल जडेजा को सौराष्ट्र टीम में जगह मिली।
16 साल की उम्र में खेला अंडर-22 टूर्नामेंट
उनके कोच बताते हैं कि जडेजा सबसे पहले मैदान में प्रेक्टिस में आता और सबसे अंत में जाता। वह घंटों तक बल्लेबाजी करता रहता, घंटों बॉलिंग करता और इसी तरह फील्डिंग करता। जडेजा बचपन में काफी शैतान भी थे लेकिन कोच महेन्द्र सिंह के एक थप्पड़ ने उन्हें समझदार बना दिया। इस बारे वे बताते हैं कि एक क्लब मैच में मैंने उसे सीनियर खिलाडियों के खिलाफ खिलाया। उसकी पहली दो गेंदों पर एक चौका और छक्का लगा। मैंने बीच ओवर में उसे थप्पड़ मार दिया इसके बाद उसने पहली बार पांच विकेट लिए वो भी केवल 33 रन देकर।
वे कहते हैं कि मैंने सबसे ज्यादा उसे मारा लेकिन मैं जानता था कि वह भारत के लिए खेलेगा। 2002 में जडेजा ने सौराष्ट्र अंडर-14 टीम की ओर से खेलते हुए पहले ही मैच में 87 रन बनाए और 72 रन पर चार विकेट लिए। अगले एक साल में अपने जबरदस्त प्रदर्शन के बूते उन्हें अंडर-19 टीम में जगह मिल गई। वहीं 16 साल की उम्र में अंडर-22 टीम में एंट्री मिली। इसी के चलते अंडर-19 टीम इंडिया में जगह मिली। इस टूर्नामेंट में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चार विकेट लिए जबकि फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ 16 रन पर तीन विकेट लिए जिसके चलते पाक 125 रन पर सिमट गया हालांकि यह मैच भारत हार गया।

तीन तिहरे शतक लगाने वाले
जडेजा ने 121 वनडे में 1804 रन बनाए जिसमें 10 अर्धशतक शामिल है। इसमें उन्होंने 144 विकेट भी लिए हैं। वहीं 12 टेस्ट में 45 विकेट लिए हैं और 364 रन बनाए हैं। दिलचस्प बात है कि जडेजा ने घरेलू क्रिकेट में तीन तिहरे शतक लगाए हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में एक भी शतक नहीं लगा पाए हैं।
पहले मैच में फिफ्टी से नंबर वन गेंदबाज तक
जडेजा ने अपने प्रदर्शन केे बूते फर्स्ट क्लास क्रिकेट में डेब्यू करने से पहले ही इंडिया ए में जगह बना ली थी। 2006-07 में जडेजा ने सौराष्ट्र की ओर रणजी ट्रॉफी में कदम रखा। 2008 में जडेजा ने एक बार फिर अंडर-19 वर्ल्ड कप खेला। विराट कोहली की कप्तानी में खेले गए इस टूर्नामेंट को भारत ने जीता और जडेजा ने 10 विकेट लिए। इसके बाद राजस्थान रॉयल्स ने रवीन्द्र जडेजा को आईपीएल के लिए साइन कर लिया। जडेजा की काबिलियत को देखकर शेन वार्न ने उन्हें रॉक स्टार क हा। अगले साल उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 10 मैच में 776 रन बनाए और 45 विकेट भी लिए। वहीं लिस्ट ए में 198 रन बनाए और छह विकेट लिए थे। इसके बूते उन्हें श्रीलंका दौरे के लिए वनडे टीम में शामिल किया गया। अपने पहले ही वनडे में उन्होंने नाबाद 60 रन बनाए। हालांकि जडेजा को असली पहचान मिली 2013 चैंपियंस ट्रॉफी से। 2015 टूर्नामेंट में उन्होंने सबसे ज्यादा विकेट लिए और गोल्डन बॉल जीती। साथ ही ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ घरेलू टेस्ट सीरिज में 25 विकेट लिए, साथ ही छह में से 5 बार विपक्षी कप्तान माइकल क्लार्क को आउट किया। 2015 मै जडेजा वनडे के नंबर वन गेंदबाज बन थेे।
जडेजा ने अपनी life में जो कुछ पाया है अपनी मेहनत के दम पर दोस्तों हम भी अपनी life में success हो सकते है। बस शर्ट ये है कि आप को अपने काम continue, लगन और धीरज के साथ करना होगा। So friends आप को ये story अच्छी लगे तो कृपिया Share करना न भूले।
धन्यवाद।

जानिए आज़ादी के बाद भारत के विकास पर कर्जे के ऊपरी साये के बारेमे ?

हो सकता है कि आर्थिक मामलों पर केंद्रित यह आलेख आपको बहुत बोझिल लगे, लेकिन आप इसे अगर अर्थव्यवस्था की राजनीति के नज़रिए से देखने की कोशिश करेंगे, तो आप इन व्यापक प्रभावों को आसानी से समझ पायेंगे। बहरहाल इस विश्लेषण को पेश करने का मकसद आंकड़ों-सांख्यिकी की बौछार करना नहीं है। वास्तव में इसका मकसद मौजूदा संदर्भ में आम लोगों को, जो मानते हैं कि आर्थिक नीतियों से हमें क्या लेना देना, अर्थव्यवस्था के एक बेहद गंभीर पहलू से साक्षात्कार करवाना है।

हम सब लगातार आर्थिक विकास के पहलुओं के संदर्भ में सरकार के तरफ से एक वक्तव्य को बार-बार सुनते रहते हैं कि देश तरक्की कर रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि सड़कें बनी हैं, बिजली ज्यादा मिल रही है, अस्पताल भी ज्यादा बन गए हैं, इमारतें और भवन अब बहुतायत में हैं। अब सवाल यह है कि ये जो हासिल है, वह कैसे हासिल हुआ है? यह सब कुछ कितना स्थायी है? क्या एक व्यक्ति और सामाजिक प्राणी होने के नाते हम यह मानते हैं कि कर्ज़दार होकर सुविधाएं जुटा लेना एक अच्छी नीति है? कभी हमारी विकास दर 4 प्रतिशत हो जाती है, तो कभी 6 प्रतिशत, कभी 7 और 7.5 प्रतिशत। इसे ही वृद्धि दर (ग्रोथ रेट) भी कहा जाता है। वास्तव में यह वृद्धि दर होती क्या है?

अर्थव्यवस्था के सालाना आकार और स्वरूप का आकलन उस राशि से किया जाता है, जितना वित्तीय लेन-देन उस साल में किया गया; इसमें उत्पादन शामिल है। दूसरे रूप में कहें तो सभी तरह के सामानों और वस्तुओं की खरीद-बिक्री, सेवाओं के शुल्क (वकील, डॉक्‍टर, नल सुधरवाने, परामर्श लेने आदि), परिवहन, कृषि, उद्योग, खनन, बैंकिंग सरीखे क्षेत्रों में जितना लेन-देन का व्यापार होता है, उस राशि को जोड़कर यह देखा जाता है कि देश में कुल कितनी राशि का आर्थिक व्यवहार हुआ, यह उस साल का सकल घरेलू उत्पाद (यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट-जीडीपी) माना जाता है।

इस साल का जीडीपी पिछले साल के जीडीपी से कितना ज्यादा हुआ, उस अंतर को ही जीडीपी में वृद्धि के तौर पर पेश किया जाता है। इस परिभाषा में यह तो देखा जाता है कि दवाईयों और अस्पतालों का बाज़ार कितना बढ़ा, किन्तु यह नहीं देखा जाता है कि लोगों का स्वास्थ्य कितना बेहतर हुआ। अब यदि लोगों का स्वास्थ्य बेहतर होगा तो संभव है कि दवाइयों और अस्पतालों का बाज़ार कम होता जाएगा। यदि ऐसा हुआ, तो जीडीपी में कमी आएगी, जिसे हमारी मौजूदा आर्थिक नीतियों और वृद्धि दर के नज़रिए से नकारात्मक माना जाएगा।

यही बात खनन पर भी लागू होती है। हम कुदरत के शरीर को यानी पहाड़ों, नदियों, जंगलों, मिट्टी को जितना ज्यादा खोदेंगे या उसका शोषण करेंगे, उतने समय के लिए “धन का आगमन” ज्यादा होगा। तब हम मानते हैं कि अपनी संपत्ति बढ़ गयी है। आंकड़े भी यही दिखाने लगते हैं, किन्तु “निजी सम्पत्ति” बढ़ाने के लिए हमने कितनी “प्राकृतिक सम्पदा” का विनाश किया, यह आर्थिक विकास के पैमानों में दर्ज नहीं होता है।

हमारे सामने चुनौती यह है कि दुनिया भर में आर्थिक विकास को ही जनकल्याण और मानवता का पैमाना माने जाने से इनकार किया जा रहा है, किन्तु हम, भारत के लोग अभी भी ऐसे विकास के लिए लाइ-लप्पा हुए जा रहे हैं, जो बीमारी बढ़ाता है। यह केवल शरीर की बीमारी नहीं बढ़ा रहा है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक और संरचनात्मक बीमारियों को नया मुकाम दे रहा है।

हम यह नहीं सोच पा रहे हैं कि वृद्धि दर को विकास दर नहीं माना जाना चाहिए। वृद्धि दर केवल अर्थव्यवस्था के आकार को सांकेतिक रूप में प्रस्तुत करने के लिए गढ़ी गयी अवधारणा है। जबकि विकास को मापने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक-आर्थिक-लैंगिक बराबरी, सामाजिक समरसता, शांति, संसाधनों का समान वितरण सरीखे पहलुओं का संज्ञान लिया जाना अनिवार्यता होती है। हम किसी भी स्तर पर उस अनिवार्यता का पालन नहीं करते हैं।
हमारे पिछड़ेपन का स्तर यह है कि अब तक इन मानकों के आधार पर मानवीय विकास को हर साल मापने का कोई पैमाना हम विकसित ही नहीं कर पाये हैं। यही कारण है कि भारत में पोषण और स्वास्थ्य से संबंधित अखिल-भारतीय आंकड़े 8 से 10 साल में एक बार जारी होते हैं। मातृत्व मृत्यु के स्तर को 5 से 6 साल में एक बार जांचा जाता है। शिशु मृत्यु दर के आंकड़े 2 से ज्‍यादा साल देरी से आते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानवीय विकास के इन सूचकों का कोई खास महत्व “वृद्धि दर” में होता नहीं है।

हाल ही में बताया गया कि भारत अब भी उन देशों की सूची में शामिल है, जहां आर्थिक विकास की दर ज्यादा बनी हुई है। हम चीन से भी तेज गति से विकास कर रहे हैं। हम एक आर्थिक महाशक्ति हैं। कभी यह भी तो सोचना चाहिए कि पिछले 2-3 दशकों से हम जिन प्राकृतिक संसाधनों का “वहशियाना ढंग से दोहन” कर रहे हैं, वह इस “विकास” के चलते अगले 35 से 45 सालों में लगभग खतम हो जाएगा;तब क्या करेंगे? क्या विकास का जीवन केवल मानवों की एक पीढ़ी के बराबर होना चाहिए?

अब तक की बात आपको आदर्शवाद पर केंद्रित वक्तव्य लगा होगा। अब जरा इस बात पर गौर कीजिये कि हम जो विकास कर रहे हैं, यह तो तय है कि उसमें गरिमा और समानता तो नहीं ही है, किन्तु क्या उसमें आत्मनिर्भरता का एक भी अंश है? स्वतंत्रता के बाद देश के विकास के लिए सरकारों ने नीति का मार्ग अपनाया। विकास की नीति का मतलब होता है उपलब्ध संसाधनों (मानवीय-प्राकृतिक) का जिम्मेदार और जवाबदेय उपयोग करते हुए सम्मानजनक-गरिमामय और अपनी क्षमता का अधिकतम उपयोग करने की सामाजिक-आर्थिक-राजनीति स्थिति को हासिल करना; लेकिन क्या भारत ने ऐसी ही किसी सोच को अपनाया है? जवाब है – नहीं। वास्तव में अपने दैनिक जीवन की जरूरतों का विस्तार करते हुए हम इतना आगे बढ़ गए कि भारत को “कर्जे की अर्थव्यवस्था” को “विकास की अर्थव्यवस्था” के कपड़े पहनाना पड़े।

स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1950-51 में भारत की सरकार पर कुल 3059 करोड़ रुपये का कर्जा था। जानते हैं वर्ष 2016-17 के बजट के मुताबिक भारत सरकार पर कुल कितना कर्जा है? यह राशि है 74.38 लाख करोड़ रुपये; सरकार पर अपने बजट से साढ़े तीन गुना ज्यादा कर्जा है।

पिछले 66 सालों में भारत की सरकार पर जमे हुए कर्जे में 2431 गुने की वृद्धि हुई है। और यह लगातार बढ़ता गया है। हमें यह भी सोचना चाहिए कि यह कर्ज आगे न बढ़े और इसका चुकतान भी किया जाना शुरू किया जाए। जिस स्तर पर यह राशि पहुंच गयी है, वहां से इसमें कमी लाने के लिए देश के लोगों को कांटे का ताज पहनना पड़ेगा। सवाल यह है कि जब इतनी बड़ी मात्रा में कर्जा बढ़ा है, तो क्या लोगों की जिंदगी में उतना ही सुधार आया?

आंकड़े तो ऐसा नहीं बताते हैं। भारत के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 1950-51 में चालू कीमतों के आधार पर प्रतिव्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 274 रुपये थी। जो वर्ष 2015-16 में बढ़कर 93,231 रुपये हो गई। यह वृद्धि है 340 गुने की। क्या इसका मतलब यह है कि जितना कर्जा सरकारों ने लिया, उसने बहुत उत्पादक भूमिका नहीं निभाई है। सरकार का पक्ष है कि देश में अधोसंरचनात्मक ढांचे के विकास, परिवहन, औद्योगिकीकरण, स्वास्थ्य, कीमतों को स्थिर रखने और विकास-हितग्राहीमूलक योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए उसे कर्जा लेना पड़ता है।

“वृद्धि दर को विकास दर” मानने वाले नज़रिए से यह तर्क ठीक हो सकता है, किन्तु जनकल्याणकारी और स्थायी विकास के नज़रिए से इस तर्क की उम्र बहुत ज्यादा नहीं होती है क्योंकि कर्जा लेकर शुरू किया गया विकास एक दलदल की तरह होता है, जिसमें एक बार आप गलती से या अपनी उत्सुकता को शांत करने के लिए उतरते हैं, और फिर उसमें डूबते ही जाते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर कोई 6 से 8 प्रतिशत के बीच रहती है, किन्तु लोकऋण (केंद्र सरकार द्वारा लिए जाने वाला क़र्ज़) की वृद्धि दर 12 प्रतिशत प्रतिवर्ष है। यह बात दिखाती है कि एक तरफ तो प्राकृतिक संसाधनों का जो दोहन हो रहा है, वह समाज-मानवता के लिए दीर्घावधि के संकट पैदा कर रहा है, उस पर भी उसका लाभ समाज और देश को नहीं हो रहा है। उस दोहन से देश के 100 बड़े घराने अपनी हैसियत ऐसी बना रहे हैं कि वे समाज को अपना आर्थिक उपनिवेश बना सकें। इसमें एक हद तक वे सफल भी रहे हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि आर्थिक उपनिवेश बनते समाज को विकास होने का अहसास करवाने के लिए सरकार द्वारा और ज्यादा कर्जे लिए जा रहे हैं। हमें इस विरोधाभास को जल्दी से जल्दी समझना होगा और विकास की ऐसी परिभाषा गढ़ना होगी, जिसे समझाने के लिए सरकार और विशेषज्ञों की आवश्‍यकता न पड़े। लोगों का विकास होना है तो लोगों को अपने विकास की परिभाषा क्यों नहीं गढ़ने दी जाती है?

आर्थिक विकास की मौजूदा परिभाषा बहुत गहरे तक फंसाती है। यह पहले उम्मीद और अपेक्षाएं बढ़ाती है, फिर उन्हें पूरा करने के लिए समाज के बुनियादी आर्थिक ढांचे पर समझौते करवाती है, शर्तें रखती और समाज के संसाधनों पर एकाधिकार मांगती है। इसके बाद भी मंदी आती है और उस मंदी से निपटने के लिए और रियायतें मांगती है; तब तक राज्य और समाज इसमें इतना फंस चुका होता है कि वह बाज़ार की तमाम शर्तें मानने के लिए मजबूर हो जाता है क्योंकि तब तक उत्पादन, जमीन, बुनियादी सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों पर निजी ताकतों का कब्ज़ा हो चुका होता है।

जरा इस उदाहरण को देखिये। वर्ष 2008 में, जब वैश्विक मंदी का दौर आया तब भारत के बैंकों के खाते में 53,917 हज़ार करोड़ रुपये की “अनुत्पादक परिसंपत्तियां” (नान परफार्मिंग असेट) दर्ज थीं। ये वही कर्जा होता है, जिसे चुकाया नहीं जा रहा होता है या समय पर नहीं चुकाया जाता है। तब यह नीति बहुत तेज़ी से आगे बढ़ी कि मंदी से निपटने के लिए बैंकों से ज्यादा से ज्यादा ऋण दिए जाएं। यह कभी नहीं देखा गया किजो ऋण दिया जा रहा है, वह कितना उत्पादक, उपयोगी और सुरक्षित होगा। वर्ष 2011 से जो ऋण बंटे, उनमें से बहुत सारे अनुत्पादक साबित हुए।

सितंबर 2015 की स्थिति में बैंकों के खाते में 3.41 लाख करोड़ रुपये की “अनुत्पादक परिसंपत्तियां” दर्ज हो गईं। अब इस खाते की राशि, यानी जो ऋण वापस नहीं आ रहा है, को सरकारी बजट से मदद लेकर बट्टे खाते में डालने की प्रक्रिया शुरू हो गयी या उन पर समझौते किये जा रहे हैं। इस तरह की नीतियों ने भारत सरकार के आर्थिक संसाधनों के दुरुपयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। इनके कारण भी सरकार ने नया कर्जा लेने की प्रक्रिया जारी रखी।

पिछले 66 साल का आर्थिक नीतियों का अनुभव बताता है कि भारत की प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 340 गुना बढ़ी है, किन्तु लोक ऋण के ब्याज के भुगतान में 11349 गुना वृद्धि हुई है। कहीं न कहीं यह देखने की जरूरत है कि लोक ऋण का उपयोग संविधान के जनकल्याणकारी राज्य के सिद्धांत को मजबूत करने के लिए हो रहा है या नहीं? यह पहलू तब महत्वपूर्ण हो जाता है जब देश में 3 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हों और 20 करोड़ लोग हर रोज भूखे रहते हों।

Thanks
Vikas jain (ndtv)

जानिए ओड community और ओड़िसा राज्य से जुड़े इतिहास के बारेमे।

ओड जाती और ओड़िसा का इतिहास wikipedia के मुताबिक बोहत पुराना है। ओड community भारत की सबसे महत्वपुर्ण और पूरानी community में से एक है। आज हम उसी ओडिसा और उनसे जुड़े ओड़ कम्युनिटी के बारेमे बात करेगे।

प्राचीन काल से मध्यकाल तक ओडिशा राज्य को कलिंग, उत्कल, उत्करात, ओड्र, ओद्र, ओड्रदेश, ओड, ओड्रराष्ट्र, त्रिकलिंग, दक्षिण कोशल, कंगोद, तोषाली, छेदि तथा मत्स आदि नामों से जाना जाता था। परन्तु इनमें से कोई भी नाम सम्पूर्ण ओडिशा को इंगित नहीं करता था। अपितु यह नाम समय-समय पर ओडिशा राज्य के कुछ भाग को ही प्रस्तुत करते थे।
वर्तमान नाम ओडिशा से पूर्व इस राज्य को मध्यकाल से ‘उड़ीसा’ नाम से जाना जाता था, जिसे अधिकारिक रूप से 04 नवम्बर, 2011 को ‘ओडिशा’ नाम में परिवर्तित कर दिया गया। ओडिशा नाम की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द ‘ओड्र’ से हुई है। इस राज्य की स्थापना भागीरथ वंश के राजा ओड ने की थी, जिन्होने अपने नाम के आधार पर नवीन ओड-वंश व ओड्र राज्य की स्थापना की। समय विचरण के साथ तीसरी सदी ई०पू० से ओड्र राज्य पर महामेघवाहन वंश, माठर वंश, नल वंश, विग्रह एवं मुदगल वंश, शैलोदभव वंश, भौमकर वंश, नंदोद्भव वंश, सोम वंश, गंग वंश व सूर्य वंश आदि सल्तनतों का आधिपत्य भी रहा।
प्राचीन काल में ओडिशा राज्य का वृहद भाग कलिंग नाम से जाना जाता था। सम्राट अशोक ने 261 ई०पू० कलिंग पर चढ़ाई कर विजय प्राप्त की। कर्मकाण्ड से क्षुब्द हो सम्राट अशोक ने युद्ध त्यागकर बौद्ध मत को अपनाया व उनका प्रचार व प्रसार किया।[1] बौद्ध धर्म के साथ ही सम्राट अशोक ने विभिन्न स्थानों पर शिलालेख गुदवाये तथा धौली व जगौदा गुफाओं (ओडिशा) में धार्मिक सिद्धान्तों से सम्बन्धित लेखों को गुदवाया।[2] सम्राट अशोक, कला के माध्यम से बौद्ध धर्म का प्रचार करना चाहते थे इसलिए सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को और अधिक विकसित करने हेतु ललितगिरि, उदयगिरि, रत्नागिरि व लगुन्डी (ओडिशा) में बोधिसत्व व अवलोकेतेश्वर की मूर्तियाँ बहुतायत में बनवायीं। 232 ई०पू० सम्राट अशोक की मृत्यु के पश्चात् कुछ समय तक मौर्य साम्राज्य स्थापित रहा परन्तु 185 ई०पू० से कलिंग पर चेदि वंश का आधिपत्य हो गया था। चेदि वंश के तृतीय शासक राजा खारवेल 49 ई० में राजगद्दी पर बैठा तथा अपने शासन काल में जैन धर्म को विभिन्न माध्यमों से विस्तृत किया, जिसमें से एक ओडिशा की उदयगिरि व खण्डगिरि गुफाऐं भी हैं। इसमें जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ व शिलालेख प्राप्त हुए हैं। चेदि वंश के पश्चात् ओडिशा (कलिंग) पर सातवाहन राजाओं ने राज्य किया। 498 ई० में माठर वंश ने कलिंग पर अपना राज्य कर लिया था।
माठर वंश के बाद 500 ई० में नल वंश का शासन आरम्भ हो गया। नल वंश के दौरान भगवान विष्णु को अधिक पूजा जाता था इसलिए नल वंश के राजा व विष्णुपूजक स्कन्दवर्मन ने ओडिशा में पोडागोड़ा स्थान पर विष्णुविहार का निर्माण करवाया। नल वंश के बाद विग्रह एवं मुदगल वंश, शैलोद्भव वंश और भौमकर वंश ने कलिंग पर राज्य किया। भौमकर वंश के सम्राट शिवाकर देव द्वितीय की रानी मोहिनी देवी ने भुवनेश्वर में मोहिनी मन्दिर का निर्माण करवाया। वहीं शिवाकर देव द्वितीय के भाई शान्तिकर प्रथम के शासन काल में उदयगिरी-खण्डगिरी पहाड़ियों पर स्थित गणेश गुफा (उदयगिरी) को पुनः निर्मित कराया गया तथा साथ ही धौलिगिरी पहाड़ियों पर अर्द्यकवर्ती मठ (बौद्ध मठ) को निर्मित करवाया। यही नहीं, राजा शान्तिकर प्रथम की रानी हीरा महादेवी द्वारा 8वीं ई० हीरापुर नामक स्थान पर चौंसठ योगनियों का मन्दिर निर्मित करवाया गया।
6वीं-7वीं शती कलिंग राज्य में स्थापत्य कला के लिए उत्कृष्ट मानी गयी। चूँकि इस सदी के दौरान राजाओं ने समय-समय पर स्वर्णाजलेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर व शत्रुघनेश्वर मन्दिरों (6वीं सदी) व परशुरामेश्वर (7वीं सदी) में निर्माण करवाया। मध्यकाल के प्रारम्भ होने से कलिंग पर सोमवंशी राजा महाशिव गुप्त ययाति द्वितीय सन् 931 ई० में गद्दी पर बैठा तथा कलिंग के इतिहास को गौरवमयी बनाने हेतु ओडिशा में भगवान जगन्नाथ के मुक्तेश्वर, सिद्धेश्वर, वरूणेश्वर, केदारेश्वर, वेताल, सिसरेश्वर, मारकण्डेश्वर, बराही व खिच्चाकेश्वरी आदि मन्दिरों सहित कुल 38 मन्दिरों का निर्माण करवाया।
15वीं शती के अन्त तक जो गंग वंश हल्का पड़ने लगा था उसने सन् 1038 ई० में सोमवंशीयों को हराकर पुनः कलिंग पर वर्चस्व स्थापित कर लिया तथा 11वीं शती में लिंगराज मन्दिर, राजारानी मन्दिर, ब्रह्मेश्वर, लोकनाथ व गुन्डिचा सहित कई छोटे व बड़े मन्दिरों का निर्माण करवाया। गंग वंश ने तीन शताब्दियों तक कलिंग पर अपना राज्य किया तथा राजकाल के दौरान 12वीं-13वीं शती में भास्करेश्वर, मेघेश्वर, यमेश्वर, कोटी तीर्थेश्वर, सारी देउल, अनन्त वासुदेव, चित्रकर्णी, निआली माधव, सोभनेश्वर, दक्क्षा-प्रजापति, सोमनाथ, जगन्नाथ, सूर्य (काष्ठ मन्दिर) बिराजा आदि मन्दिरों को निर्मित करवाया जो कि वास्तव में कलिंग के स्थापत्य इतिहास में अहम भूमिका का निर्वाह करते हैं। गंग वंश के शासन काल पश्चात् 1361 ई० में तुगलक सुल्तान फिरोजशाह तुगलक ने कलिंग पर राज्य किया। यह वह दौर था जब कलिंग में कला का वर्चस्व कम होते-होते लगभग समाप्त ही हो चुका था। चूँकि तुगलक शासक कला-विरोधी रहे इसलिए किसी भी प्रकार के मन्दिर या मठ का निर्माण नहीं हुअा।
18वीं शती के आधुनिक काल में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का सम्पूर्ण भारत पर अधिकार हो गया था परन्तु 20वीं शती के मध्य में अंग्रेजों के निगमन से भारत देश स्वतन्त्र हुआ। जिसके फलस्वरूप सम्पूर्ण भारत कई राज्यों में विभक्त हो गया, जिसमें से भारत के पूर्व में स्थित ओडिशा (पूर्व कलिंग) भी एक राज्य बना।
प्राचीन इतिहास
ओडिशा राजा ओद् ने बसाया व अपने नाम पर ओड्वंश चलाया जौ भागीरथवंशज थे। ओड भागीरथ वंशज है इसी लिए भगीरथ पुरे भारत में जहाँ जहाँ घूमे वहा वहा ओड मिलेंगे पुरे भारत में 5 करोड़ से भी ज्यादा ओड की बस्ती है।
From wikipedia

सफलता के लिए ज़रूरी है Focus !

ऐसा  क्यों  होता  है  कि  कई बार  सब  कुछ  होते  हुए  भी  हम  वो  नहीं  कर  पाते  जिसको  करने  के  बारे  में   हमने  सोचा  होता  है ….दृढ  निश्चय  किया  होता ……खुद  को  promise किया  होता  है  कि  हमें  ये  काम  करना  ही  करना  है …चाहे  जो  हो  जाए ….!!!

“सब  कुछ  होते  हुए” से  मेरा  मतलब  है  आपके  पास  पर्याप्त  talent, पैसा ,  समय , या  ऐसी  कोई  भी  चीज  जो  उस  काम  को  करने  के  लिए  ज़रूरी  है ;  होने  से  है .

2009-10 ek vyakti ne अपने  दोस्तों  के  साथ  मिल  कर  Bodhitree Consulting Group (BCG) की  शुरुआत  की  थी , इसके  अंतर्गत  हमने  कुछ  Personality Development ओर  Quizzing से  related programs भी  किये , जो  काफी  पसंद किये  गए ,….पर  within 6-7 months BCG को  बंद  करना  पड़ा .

आज  जब  vo  इस  बारे  में  सोचता  hai कि  आखिर  BCG क्यों  unsuccessful रहा  …तो  use ऐसी  कोई  वजह  नहीं  दिखती  जो  इस  ओर  इशारा  करे  की  हमारे  team में  Talent, Time , या  पैसे  की  कमी  थी ….हमारे  अन्दर  जोश  भी  काफी  था ….पर  फिर  भी  हम  इस  venture को  successful नहीं  बना  पाए .

तो  आखिर  वजह  क्या थी ?

वजह  थी  FOCUS.

चूँकि  BCG शुरू  करने  का  initiative uska  ही  था  इसलिए  मुझे  इसपर  पूरी  तरह  से  अपना  ध्यान  केन्द्रित  करना  चाहिए  था …..पर vo उस  वक़्त   अपनी  Tata Aig की  जॉब  में  इतना  अधिक  involve था  कि  मैं  BCG पर focus नहीं  कर  पाया …और  सबकुछ  होते  हुए  भी  इसे  सफल  नहीं  बना  पाए .

यह  एक  शाश्वत  सत्य  है  कि  सम्पूर्ण  ब्रह्माण्ड में  हम  जिस  चीज  पर  ध्यान  केन्द्रित  करते  हैं  उस  चीज  में  आश्चर्यजनक  रूप  से  विस्तार  होता  है . इसलिए  सफल  होने  के  लिए  हमें  अपने  चुने  हुए  लक्ष्य   पर  पूरी  तरह  से  focussed होना  होगा ; और  तभी  हम  उसे  हकीकत  बनते  देख  पायेंगे .

Focus करने  का  क्या अर्थ  है ?

एक  idea लो  . उस  idea को  अपनी  life बना  लो – उसके  बारे  में  सोचो  उसके  सपने  देखो , उस  idea को  जियो  . अपने  दिमाग , muscles, nerves, शरीर  के  हर  हिस्से  को  उस  आईडिया  में  डूब  जाने  दो , और  बाकी  सभी  ideas को  किनारे  रख  दो . यही सफल  होने  का  तरीका  है , यही  वो  तरीका  है  जिससे  महान  लोग  निर्मित  होते  हैं .

Friends, उपरोक्त  कथन Swami  Vivekananda के  हैं  और  मुझे  लगता  है  कि  Focus शब्द को  शायद  ही  इससे  अच्छे  ढंग  से  समझा  जा  सकता  है .

इस कथन में जहाँ स्वामी जी ने  किसी एक आईडिया को अपनाना आवश्यक बताया  है वहीँ दूसरी तरफ इस दौरान अन्य ideas को किनारे रखने के लिए भी कहा है. और सही मायने में यही है Focussed होना.

Focus करता  क्या  है  ?

आपने  बचपन  में  lens ज़रूर use किया  होगा ….lens देखने  में  तो  एक  साधारण  कांच  का  टुकड़ा  लगता  है …पर  जब  हम  उसे  कागज़  के  किसी  एक  हिस्से  पर  focus करते   हैं  तो  थोड़ी  देर  में  वो  कागज़  जलने  लगता  है …..

Focus  चीजों  को  संभव  बनाता  है ….जब  आप  भी  अपने  goal पर  focused रहते  हैं  तो  मार्ग  में  आने  वाली  बाधाएं   जल  कर  ख़ाक  हो  जाती  हैं , आपका  रास्ता  साफ़  हो  जाता   है , और  आप  अपना  goal achieve कर  पाते  हैं . Focus आपको  सिर्फ  यह  नहीं  बताता  कि  करना  क्या  है  , यह  भी  बताता  है  कि  क्या  नहीं  करना  है .Focus आपको  आपके  goal से  बांधता  ही  नहीं  , आपको   बेकार  की  चीजों  में  बंधने  से  बचाता  भी  है .

सफल होना है तो ए 10 बाते हमेशा ध्यान रखे !

आम इंसान मेहनत तो करते है लेकिन सफलता नहीं मिलती और उसी के कारन वो निराश हो जाते है लेकिन उन्हें निराश होने की जरुरत नहीं है वो भी अपने जीवन में कुछ बदलाव लाकर अपनी Life को बेहतर और successful बना सकते है। इसी लिए ध्यान में रखने वाली 10 बाटे आपके साथ शेयर कर रहा हूँ।

1. जो समय बीत चूका है उसे बदल नहीं सकते तो उसके बारे में सोच कर पछताने से अच्छा है
अपने भविष्य को बेहतर बनाना । इसलिए बीती बातो को छोड़ कर आगे के बारे में सोचो और
खाली बैठने की जगह कोई न कोई काम करों।

2. ये बात अच्छी तरह समझ लीजिये की दुनिया में जो भी है वो सबकुछ बदलेगा, फिर चाहे आप
उन बदलावों को अपनाये या नहीं । इसलिए दुनिया के बदलने से पहले खुद को इतना बदल दो
की इस दुनिया के बदले से पहले आप दुनिया का आगे आ कर स्वागत करो की देखो मैं यहाँ पहले
से पहुच गया हूँ। मेरा मतलब है ऐसा काम करने की कोशिश करो जो आज तक किसी ने न किया हों । मशहूर हों जाओगे।

3. जब भी कोई नया काम शुरू करो तो उसे ये सोच कर शुरू करो की ये मेरा आखरी मौका है
और अगर में इसमें पास नहीं हुआ तो मुझे और कोई मौका नहीं मिलेगा। इसलिए चाहे कुछ
भी हों जाये मुझे ये मौका हाथ से निकलने नहीं देना हैं।

4. हमेशा अपने आपको नये होने वाले बदलावों और आगे आने वाली कठिनाइयों का सामना करने के लिए तैयार रखो।
जिससे आप अपनी मंजिल आसानी से हासिल कर सको। वरना ऐसे पछताना पड़ेगा जैसे
वक़्त पर पढाई न करने वाला स्टूडेंट पछताता हैं की काश में पहले से तैयारी करके रखता तो फ़ैल न होता।

5. कभी भी पुरानी बातो को ले कर बैठे नहीं रहें। इससे आप किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकते उलटे खुद का ही
नुकसान करोगे। बेहतर होगा की अतीत को भुला कर कुछ नया करने की सोचे।

6. कहते है की जब एक रास्ता बंद हों जाता है तो भगवान 100 और रस्ते खोल देता हैं।
इसलिए हमे किसी काम में असफलता मिलने पर घबराना नहीं चाहिए बल्कि ये पता करना चाहिए
की इस काम को करने का दूसरा तरीका क्या हैं।

7. कभी भी किसी काम को कल पर न छोड़े, हर काम को अपना आखरी काम मान कर अच्छे से करना चाहियें।
कल के भरोशे काम छोड़ने वालो को दुनिया में आलसी और असफल कहा जाता हैं।

8. कभी भी किसी काम में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। अगर ऐसा करोगे तो आपको उसके बारे में कुछ भी समझ नहीं
आएगा और आपको उसमे असफलता ही मिलेगी। इसलिए हर काम को काम समझ कर करे और उसकी
बारीकी तक पहुचे जिससे भविष्य में आपको उसमे परेशानी न हों।

9. अगर कभी आप किसी काम में अकेले पड़ जाओ तो घबराये नहीं। आप अकेले नहीं हों जो मंजिल पर न पहुचोगे।
दुनिया के 70% कामयाब लोगो ने अकेले ही सफ़र तय किया हैं।

10. कहते है की एक पागल की बातो में भी कोई न कोई अच्छी सिख मिल जाती हैं।
इसलिए कभी भी किसी की सलाह को नज़रंदाज़ मत करो। उसके बारे में बारीकी से सोचो और सोच कर उसे जवाब दो।
हों सकता है उसमे आपका कोई फायदा हों।

धन्यवाद freind
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महज 2 हजार रुपए से कैसे बना दी 1.5 लाख करोड़ की कम्पनी जानिए सुब्रत रॉय के बारेमे।

बिहार के एक छोटे से शहर में जन्मे इस शख्स ने एक स्कूटर और महज 2 हजार रुपए की रकम के साथ कारोबारी सफर शुरू किया। छोटी सी शुरुआत के बाद एकसमय उनका बिजनेस एम्पायर 1.5 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। उनका नाम है सुब्रत रॉय सहारा, जो अब जेल में दिन काट रहे हैं। एक समय उन्हें देश के टॉप 10 बिजनेसमैन में शुमार किया जाने लगा था। हम यहां पर सुब्रत रॉय के बिजनेस टायकून बनने के सफर के बारे में बता रहे हैं…
1 रुपए के डिपॉजिट से शुरू किया था बिजनेस
10 जून 1948 को बिहार के अररिया में जन्मे सुब्रत रॉय की स्कूली पढ़ाई कोलकाता में हुई। बाद में उन्होंने गोरखपुर के गवर्नमेंट टेक्निकल स्कूल से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की।
उनके कारोबारी सफर की शुरुआत भी गोरखपुर से हुई। रॉय ने 1978 में छोटे स्तर पर बिजनेस शुरू किया। शुरुआत में वह महज 1 रुपए का डिपॉजिट लिया करते थे। उनके जमाकर्ताओं में अधिकांश छोटे तबकों से थे, जिनसे वह आम तौर पर रोजाना पैसे लेने के लिए जाया करते थे।
खड़ा किया 1.5 लाख करोड़ रुपए का एम्पायर
बिजनेस बढ़ने के साथ उन्होंने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई और पैसे जुटाने के लिए कर्मचारी जाने लगे। 1990 के दशक में उन्होंने अपना बिजनेस मॉडल भी पूरी तरह बदल दिया।
इस प्रकार महज 1 रुपए के डिपॉजिट के साथ ही शुरू हुआ सहारा का बिजनेस 35 साल में 1.5 लाख करोड़ रुपए का एम्पायर बन गया। 2000 के दशक में उनके कार्यालयों की संख्या 4,799 तक पहुंच गई। उन्होंने 42 डिपॉजिटर्स के साथ शुरुआत की थी। लगभग तीन दशक के दौरान उनके डिपॉजिटर्स की संख्या 6 करोड़ से ज्यादा हो गई थी।

2 हजार रुपए और एक लंबरेटा स्कूटर के साथ शुरू किया बिजनेस
वर्ष 1978 में उन्होंने गोरखपुर में एक छोटा सा ऑफिस खोला। उन्होंने अपने बिजनेस की शुरुआत महज 2 हजार रुपए और एक लंबरेटा स्कूटर के साथ की थी। उनके ऑफिस में एक मेज और दो कुर्सियां थीं। कर्मचारियों के नाम पर सिर्फ एक क्लर्क और एक लड़का (रनर ब्वॉय) था। उन्होंने अकेले ही डिपॉजिट और पैरा बैंकिंग बिजनेस की शुरुआत की। वह क्लाइंट के पास जाकर खुद ही पैसे जमा करते थे।
बिजनेस बढ़ने के साथ उन्होंने कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई और पैसे जुटाने के लिए कर्मचारी भी जाने लगे। 1990 के दशक में वह अपने बिजनेस मॉडल को बदलने की स्ट्रैटजी के बारे में भी सोचने लगे थे।
बदला बिजनेस मॉडल,लखनऊ को बनाया बेस
बिजनेस बढ़ने के साथ ही सहारा ने अपने कारोबारी मॉडल को बदल दिया। इसके लिए किसी बड़े शहर में अपनी कंपनी का बेस बनाना जरूरी था। उन्होंने इसके लिए लखनऊ को चुना, जो गोरखपुर से ज्यादा दूर नहीं था और उत्तर प्रदेश की राजधानी भी था। उन्होंने वर्ष 1990 में  लखनऊ का रुख किया और वहां अपना ऑफिस शुरू किया। इसके बाद उनका बिजनेस लगातार बढ़ता ही गया। सहारा इंडिया की वेबसाइट के मुताबिक फिलहाल उसके सैलरीड और फील्ड वर्कर्स की संख्या 11 लाख है।
देश के टॉप10पावरफुल लोगों में हुए शामिल
जल्द ही वह देश के ताकतवर लोगों में शुमार होने लगे। बिजनेस के अलावा इसकी वजह उनके राजनीतिक और दूसरे क्षेत्रों की बड़ी हस्तियों से संबंध भी थे।
-2012 में देश की एक अग्रणी मैगजीन इंडिया टुडे ने उन्हें देश के टॉप 10 पावरफुल लोगों की लिस्ट में शामिल किया।
-इसके अलावा दुनिया की अग्रणी टाइम मैगजीन ने 2004 में सहारा को इंडियन रेलवे के बाद भारत का ‘दूसरा बड़ा इम्पलॉयर’ करार दिया।
देश-विदेश में खड़ी कीं अरबों की ये संपत्तियां
सहारा इंडिया समूह ने अपने तीन दशक से ज्यादा के ऑपरेशन के दौरान हजारों करोड़ रुपए की संपत्तियां खड़ी कीं। इसमें भारत के कई छोटे-बड़े शहरों में सहारा के रियल्टी प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। देश-विदेश में उन्होंने कई बड़े एसेट्स को खरीदा।
-ग्रोसवेनर हाउस होटल, लंदनः फोर्ब्‍स के मुताबि‍क, लंदन के ग्रोसवेनर हाउस को सहारा ग्रुप ने साल 2010 के अंत में 72.6 करोड़ डॉलर (करीब 3270 करोड़ रुपए ) में खरीदा था।
-प्‍लाजा होटल, न्‍यूयॉर्कः फोर्ब्‍स के मुताबि‍क, नवंबर 2012 में सुब्रत राय सहारा ने प्‍लाजा होटल को 57.5 करोड़ डॉलर (तक करीब 3120 करोड़ रुपए) में खरीदा था।
-ड्रीम हाउसटाउन होटल,  न्‍यूयॉर्कः सुब्रत राय सहारा ने ड्रीम हाउसटाउन होटल को 2012 में 22 करोड़ डॉलर (तब करीब 1,188 करोड़ रुपए ) में खरीदा था।
-सहारा स्‍टार होटल, मुंबईः  सहारा स्‍टार एक 5 स्‍टार होटल है जो मुंबई के डोमेस्‍टि‍क एयरपोर्ट के सामने बना है। होटल का दावा है कि‍ इसके पास दुनि‍या का अकेला मरी‍न लीव्‍स के साथ प्राइवेट डाइनिंग रूम है।

सेबी के निशाने पर आए,बढ़ीं मुश्किलें
सहारा समूह 2009 में ही सेबी के निशाने पर आ गया था। सहारा समूह की दो कंपनियों सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसआईआरईसीएल) और सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसएचआईसीएल) ने रियल एस्टेट में निवेश के नाम पर 3 करोड़ से अधिक निवेशकों से 17,400 करोड़ रुपए जुटाए थे। सितंबर 2009 में सहारा प्राइम सिटी ने आईपीओ लाने के लिए सेबी में डॉक्‍युमेंट जमा किए। सेबी ने अगस्त, 2010 में दोनों कंपनियों की जांच करने के आदेश दिए थे। विवाद बढ़ता गया और आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह की दोनों कंपनियों को निवेशकों को करोड़ों रुपए लौटाने के आदेश दिए थे। सहारा निवेशकों की रकम लौटा नहीं सके और आखिरकार वह गिरफ्तार हो गए।
फिर भी हमें salute करना चाहिए ऐसे इंसान को जो अर्स से फर्स तक पोहचा और उसने लोगो का Investment का नजरिया बदला। प्रॉब्लम चाहे कुछ भी हो लेकिन अपने दम पर सुब्रत रॉय ने कितनो कि जिंदगी बदली इसी लिए हम ने ये स्टोरी आप के साथ शेयर की। इंसान से गलती हो सकती है इंसान गलत नहीं होता। अगर ये स्टोरी आप को अच्छि लगी हो तो शेयर करना न भूले।
धन्यवाद।